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Showing posts from June, 2026

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला 2)

‎ ‎हेम के दोहे (बाल जनऊला 2) ‎ ‎रतिहा आवय काम मा, बटन मसक दे थोर। ‎रहिथे चुप अरझे परे, लावय बड़ अंजोर।। ‎ ‎नान-नान धर दाँत मा, सुलझा देवय केस। ‎उलझन ला दुरिहा भगा, बूझव येकर भेस।। ‎ ‎करिया काया ला धरे, पहिरे उप्पर कोट। ‎उज्जर पन्ना ला भरे, होवत जावय छोट।। ‎ ‎मुड़ मा नाचे पाँव बिन, तन के तानय तार। ‎बरखा चाहे घाम हो, बन जावय रखवार।। ‎ ‎झूठ कपट रखथे कहाँ, सच के देथे साथ। ‎जइसे ला तइसे दिखा, धरय जेन हा हाथ।। ‎ ‎नान नान कड़गी जुरे, जेकर पाँव हजार। ‎कचरा दुश्मन तोर ये, खेदय घर के पार।। ‎ ‎दून्नो संगी एक हो, जावय खेती खार। ‎काँटा खूँटी ले बचा, सेवा देय अपार।। ‎ ‎पोथी कापी ला भरे, अपन पेट भंडार। ‎नोनी बाबू संग चल, बनके पक्का यार।। ‎ ‎दूठन चक्का ले चले, कसरत के ये खेल। ‎पैसा हर बांचय घलो, अपन पाँव ले पेल।। ‎ ‎नइहे मुँह ता बोलथे, निकले तोर पुकार। ‎टन-टन करके सोर दे, हो जावय तैयार।। ‎ ‎उत्तर : १. बल्ब (बिजली बत्ती) 💡 | २. कंघी 🪮 | ३. पेंसिल ✏️ | ४. छाता ☂️ | ५. आईना (दर्पण) 🪞 | ६. झाड़ू 🧹 | ७. पनही-चप्पल 🩴 | ८. बस्ता 🎒 | ९. साइकिल 🚲 | १०. घंटी 🔔 ‎ ‎रचनाकार - हेमलाल साहू ‎चिरई के गाँव - गिध...

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला-1)

‎ ‎हेम के दोहे (बाल जनऊला-1) ‎ ‎नाच नचावय अंगरी, बड़का हवय सुजान। ‎दुनिया भर के गोठ ला, पहुँचाय तोर कान।। ‎ ‎संग दिखे अंजोर मा, फेर चलय ना साँस। ‎हाथ लगा आवय नहीं, अंधियार मा नास।। ‎ ‎बिन संगी आधार ना, जोड़ी बिन बेकार। ‎पहरा देवय बैठ के, असली पहरेदार।। ‎ ‎सूंघ-सूंघ पहिचान ले, पावय लाड दुलार। ‎चोर उचक्का देख के, ओला करय फरार।। ‎ ‎एक गोल डिबिया धरय, बारहठन के अंग। ‎तीन सिपाही सँग चले, समय बतावय रंग।। ‎ ‎पन्ना अपन समेट के, भर रखथे भंडार। ‎मोती दाना खोज के, मन के दीया बार।। ‎ ‎अपन पसीना सींचथे, उठथे होत बिहान। ‎लावय हरियर सोनहा, कोन हरे पहिचान।। ‎ ‎हरियर थाली ले भरे, पहिरय बाली सोन। ‎चार मुड़ा ले डाड़ हे, बता सखी ये कोन।। ‎ ‎एक जगे दूजा सुते, अपन चढ़ावय रंग। ‎जिनगी के गाड़ी चले, रहय कभू ना संग।। ‎ ‎नान्हे दाना पेट मा, धर रखथे जग छाँव। ‎बड़का हो फल-फूल दे, बूझव संगी नाँव।। ‎ ‎उत्तर:-1. मोबाइल, 2. छइहाँ (परछाई), 3. तारा-कूची (ताला-चाबी), 4. कुकुर (कुत्ता), 5. घड़ी, 6. पोथी (किताब), 7. किसान, 8. खेती-खार (खेत-खलिहान), 9. दिन-रात, 10. बीजा (बीज) ‎ ‎रचनाकार - हेमलाल साहू ‎चिरई के गाँव - गिधवा, ...

‎खेलँय संगी (चौपाई छंद)‎

‎खेलँय संगी (चौपाई छंद) ‎ ‎खेलँय संगी बाँटी भौरा। ‎राउत पारा, दाऊ चौरा।। ‎ ‎गोल गोल ले भौरा नाँचय। ‎देख देख के लइका हाँसय।। ‎ ‎बगड़ू बल्ला खिंचे रस्सी। ‎कोन जीतथे रस्सा कस्सी।। ‎ ‎देखय गंगा बंटी बल्लू। ‎बैठे तीर मा कुकुर कल्लू।। ‎ ‎घाम चढ़े ले खेलँय फुगड़ी। ‎लइका सकलाइन बन जुगड़ी।। ‎ ‎खेल कबड्डी पीटय ताली। ‎दाँव परे ले चिन्हा लाली।। ‎ ‎संझा बेरा चोर-सिपाही।   ‎लुका-छुपी मा माजा आही।। ‎ ‎खेल लंगड़ी अंधा कानी। ‎गाँव गली के खेल निशानी।। ‎ ‎रेस टीप खेलँय पचरंगा। ‎ठप्पा बजा भाग ले गंगा।। ‎ ‎घांदी मूंदी खेल सहेली। ‎खेल खेल मा पूछ पहेली।। ‎ ‎खेलँय कोलाल धरे डंडा। ‎नवा-नवा खेले के फंडा।। ‎ ‎खोखो खेलँय मन भर भागँय। ‎बइठे खड़े दाँव ला पालँय।।  ‎ ‎डंडा मारय उड़थे गिल्ली ।  ‎जइसे जाये जहाज दिल्ली।। ‎ ‎सगली भदली खेल सजावँय। ‎पुतरी-पुतरा बिहा रचावँय।। ‎ ‎मोबाइल के छोड़ खुमारी। ‎खेल बने असल संगवारी।। ‎ ‎खेल खेल मा होवय योगा। ‎तन मन होवै पोठ निरोगा।। ‎ ‎रचनाकार-हेमलाल साहू ‎गाँव - गिधवा, जिला -बेमेतरा  ‎ ‎ ‎

जुगनू राजा

जुगनू राजा हमर गाँव के जुगनू राजा। कहाँ लुकागे दउड़त आजा। छोटे नाक-कान हे आँखी। सुग्घर हावय दू ठन पाँखी।। पहली रोज घूम के जावच। मया अँजोरी के बगरावच।। अब डर्रा मन साँपे नाचय। मोबाइल मा उजास बाँचय।। नइ समझेन तोर पीरा ला। जहर डार मारे कीरा ला।। काटे जंगल झाड़ी भारी। उजड़त हे तोर घर दुवारी।। छाये घर तोर निराशा हे। आही अंजोर अब आशा हे।। फेर चमक हू हरियर पीला। अपन दिखाहू गज्जब लीला।। रचनाकार- हेमलाल साहू गांव - गिधवा, जिला - बेमेतरा

साइकिल

पहली रहिस साइकिल, घर के शान। ‎रहय अपन घर के ओ, बन पहिचान।। ‎ ‎दीदी नोनी बाबू, सबो सियान। ‎दाई बबा चलावय, सबो जवान।। ‎ ‎कम खर्चा पानी मा, चलय गुजार।। ‎दौड़य गली खोर अउ, सब संसार।। ‎ ‎ट्रिन ट्रिन बजाय घंटी, देय धियान। ‎लान साइकिल लेवय, काम किसान।। ‎ ‎पगडंडी मा भागय, बड़ रफ्तार। ‎गाँव शहर ला घूमे, पैडिल मार।। ‎ ‎एक एक पैडिल के, खूब धमाल। ‎तोर बना सेहत ला, करय कमाल।। ‎ ‎डीजल तेल के नहीं, बनय गुलाम। ‎मिहनत बदला सेहत, मिलय इनाम।। ‎ ‎बिना प्रदूषण दौड़ा, इहि जग सार। ‎चला साइकिल करलव, मया दुलार।। ‎ ‎रचनाकार - हेमलाल साहू ‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा ‎