🌟 हेम के दोहे (बाल जनऊला–5) 🌟 कागज उप्पर नाचके, पोकय मस के लीक। अपन पेट खाली करे, नाव बतालव ठीक।। हरियर लुगरा ओढ़ के, ठाड़े दिन अउ रात। जेठ घाम मा छाँव दे, सबके करय सहात।। रतिहा फूलय डार मा, टप टप झरय बिहान। महर महर ममहाय ले, दुरिहा ले पहिचान।। एक पेड़ सीधा खड़े, छूये जाय अगास। दुब्बर पातर ये रहे, आवय कामें खास।। झब्बू पूँछ उठाय के, कूदय नाचय डार। करिया धारी पीठ मा, करथे चिर्र-पुकार।। काया हरियर रंग के, टप-टप कूदत जाय। पानी गिरथे सनसना, टरर-टरर नरियाय।। धरती भीतर घर करे, मुँह ऊपर हे खोल। प्यासा आके तीर मा, पानी पाय अमोल।। काया हरियर लाल मुख, गुरतुर बोली बान। मनखे जइसन गोठिया, बूझव नाम सुजान।। रंग बिरंगी पाँख ले, फूल फूल मंडराय। रस चूसे मुँह नानकुन, घूम घूम इतराय।। पानी भीतर घर करे, बिन पानी मर जाय। आँखी खोले रात दिन, पलक नहीं झपकाय।। उत्तरमाला : कलम 🖋️ | रुख (पेड़)🌳 | महुआ 🌼 | बाँस 🎋 | गिलहरी 🐿️ | मेचका (मेढ़क)🐸 | कुँआ 💧 | मिट्ठू (तोता)🦜 | तितली 🦋 | मछरी (मछली)🐟 रचनाकार – हेमलाल साहू चिरई के ...
हेम के दोहे (बाल जनऊला 4) डेरा रहय अगास मा, पाँव बिना चल जाव। काँवर मा पानी भरे, गाँव-गाँव बरसाव।। लेवय जनम पहाड़ मा, पालय पोसय गाँव। भुइयाँ मा इतरात चल, सागर मा मिल जाव।। करिया टूरा नानकुन, पीसत चकना चूर। नाक चढ़य ता छींक दे, महिमा हे भरपूर।। दाँत नहीं पर काट दे, झटकुन देवय फाँक। दू पल्ला बिन सून हे, बूझव थोकुन झाँक।। दुब्बर पातर नानकुन, मुँह मा चोखा धार। लकर धकर ले कूद के, कपड़ा कर तैयार।। रतिहा बुग-बुग ले बरय, रुख राई मा बास। बिन बाती बिन तेल के, जगमग करथे खास।। करिया काया ला धरे, कउवा जस झन मान। बइठे रुख के डार मा, गावय गुरतुर गान।। हीरा अउ मोती नहीं, भिनसरहा के हार। माड़ा हरियर पान मा, फबथे बड़ सिंगार।। बिन आगी उठथे धुआँ, भिनसरहा ले छाय। सुरुज ददा ला देख के, लटपट सरकत जाय।। माटी ले काया बनय, सुग्घर गोल मटोल। सस्ता फ्रिज गरीब के, पानी रखय अमोल।। 🌈 उत्तरमाला 🌈 ❶ बादर (बादल) ❷ नदिया (नदी) ❸ बटुरा मरिच(काली मिर्च) ❹ कैंची ❺ सुई ❻ जुगनू ❼ कोयल ❽शीत (ओस) ❾ कुहरा (कोहरा) ❿ करसा(मटका) रचनाकार – हेमलाल साहू पक्षी विहार गाँव – गिधवा,...