टप-टप बरसे सुग्घर पानी,
नान्हे मन ला भावय।
गात मया के गीत मेचका,
टर्र-टर्र ले टर्रावय।।
उत्ताधुर्रा जीभ लमावय,
फट ले कीरा खावय।
हरियर पाना ऊपर बइठे,
पानी मा इतरावय।।
चुभुक-चुभुक पानी नापय,
तिर मा बिला बनावय।
सुग्घर बरखा झड़ी देख के,
नाचत-गावत जावय।।।
हरियर पाना नाव बनाके,
रोज किंजरय तरिया।
साँप देख के कूदत-फाँदत,
भागय ओहर परिया।।
नान्हे लइका देखत रहिथे,
कहाँ मेचका जाथे।
टर्र-टर्र के बोली सुनके,
जम्मो झन मुसकाथे।।
रचनाकार - हेमलाल साहू, गिधवा (बेमेतरा)