Sunday, 16 August 2026

‎विष्णु पद छंद‎‎ नोनी‎‎ बाल कविता‎

‎विष्णु पद छंद
‎नोनी
‎बाल कविता
‎हमरो घर के नोनी हावय,
अड़बड़ गा चतुरी।
‎बात सबो के मानै चुपकन, 
काम करय बपुरी।।
‎नाप तौल मा अव्वल हावय, 
करथे कम खरचा।
‎जाके दुकान हिसाब जोड़य, 
लेवय बिल परचा।।
‎छान कुनकुना पानी पीयव, 
नोनी रोज कहै।
‎खावव भाजी पाला संगी, 
सदा निरोग रहैे।।
‎माँज धोके रखय नोनी हा, 
घर के सब टठिया।
‎सुख्खा कचरा गिल्ला कचरा, 
रखथे सब छटिया।।
‎गली-खोर ला साफ रखे ले, 
रोग भगे दुरिया।
‎तेकर सेती लीपव-पोतव, 
अँगना घर-कुरिया।।
‎पढ़ई लिखई नोनी करथे, 
बिहना ले उठके।
‎करय रोज के योगासन ला, 
मन चंगा करके।।
‎बात-बात ले सीखय नोनी, 
छोट-बड़े सब ले।
‎गुरतुर बानी छत्तीसगढ़ी, 
बोलय बड़ मन ले।।
‎कहिथे नोनी दाई भाखा, 
बोलव मान बढ़ी।
‎पढ़ई-लिखई करलव भाषा, 
ले छत्तीसगढ़ी।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू 
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 

‎मंगला चरण‎

‎मंगला चरण
‎वीणा धारी माँ सरस्वती,
‎लेके आयव आस।
‎नान्हे-नान्हे लइका हावन,
‎भर दे नवा उजास।।
‎सूरज चंदा फूल चिरैयाँ,
‎बाँटत मया-दुलार।
‎नान्हे मन ला विद्या देवव,
‎सपना दे आकार।।
‎ज्ञान के बार दीया दाई,
‎दूर होय अँधियार।
‎दया-मया अउ भलई ले,
‎महका दे दुआर।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू 
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 

Saturday, 15 August 2026

‎अपन देस बर जीबो मरबो (हेम के सरसी छंद)‎

‎अपन देस बर जीबो मरबो (हेम के सरसी छंद)
‎अपन देस बर जीबो मरबो, हमला हवय गुमान।
‎ए भारत के लाज रखे बर, अरपन तन-मन प्रान।।
‎हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, एक देस के फूल।
‎मया-दया ले महकय बगिया, सुमता हावे मूल।।
‎पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन, एक देस के जान।
‎सीमा के रखवारी करबो, बनके अमर जवान।।
‎हवै भरोसा ए जाँगर मा, करथन जी भर काज।
‎माटी ले हमर बने चोला, रखथन माटी लाज।।
‎दाई के जयकारा गावत, चलथन सीना तान।
‎बइरी कतको आवै संगी, रहिबो बन चट्टान।।
‎देस के वीर नारायण जस, जनमिन बड़का वीर।
‎भारत दाई बर लड़त-लड़त, हाँसत सहिगे पीर।।
‎डॉक्टर खूबचंद बघेल हा, हमर राज के शान।
‎स्वाभिमान के दीया बारिस, देस बढ़ाइन मान।।
‎आजादी बर लड़िन वीर मन, रखिन देस के मान।
‎ब्रिटिश राज ला मार भगाइन, गूँजिस हिन्दुस्तान।।
‎हवन हमन माटी के बेटा, माटी ले पहिचान।
‎तीन रंग ले सजे तिरंगा, हमर देस के शान।।
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला बेमेतरा (छ. ग.)

‎हेम के कुकुम्भ छंद ‎‎अमर सिपाही‎‎ बाल कविता

‎हेम के कुकुम्भ छंद
‎अमर सिपाही
‎बाल कविता
‎कहिथे नोनी सुन दाई ला, बनहूँ मँय अमर सिपाही।
‎अपन देस के रखवारी बर, तन-मन अरपन हो जाही।।
‎मोरो रग-रग मा भारत हे, बनहूँ मँय हा मर्दानी।
‎बइरी मन ले लोहा लेहूँ, बन मँय झाँसी के रानी।।
‎भारत मोरे भाग्य विधाता, रोजे मँय गावँव गाथा।
‎हे भारत भुइँया महतारी, तोर चरन टेकव माथा।।
‎बइरी मन के काल बनव मँय, घुसे नहीं सीमा द्वारी। 
‎खड़े तान के सीना रइहूँ, सौ-सौ झन बर मँय भारी।।
‎काली दुर्गा रनचंडी बन, बइरी ला मार भगाहूँ।
‎तीन रंग ले सजे तिरंगा, सदा-सदा मँय लहराहूँ।।
‎अटल खड़े रइहूँ पहाड़ जस, अपन देश के मँय सीमा।
‎देख-देख बइरी मन भागय, ताकत रखहूँ जस भीमा।।
‎बइरी कतको मार भगाहूँ, बनके मँय वीर दबंगा।
‎मर जाहूँ ता पहिरा देबे, मोला तँय कफन तिरंगा।।
‎जय भारत जय जय भारतीय, बोले दुनिया जयकारा।
‎अपन वीर बलिदानी मन के, गूँजय सबो डहर नारा।।
‎रचनाकार - हेमलाल साहू 
‎गाँव - गिधवा, जिला-बेमेतरा 

Monday, 3 August 2026

‎गरमी मा आथे आमा चौपाई छंद

‎*गरमी मा आथे आमा* चौपाई
‎गरमी मा आथे आमा हर।
‎जाबो घूमे ला मामा घर।।
‎कहिथे गरिमा, सुन गा कक्का।
‎टोर लानबो आमा पक्का।।
‎बड़का बाग हवय आमा के।
‎सुघ्घर हावय घर मामा के।।
‎लटलट ले फरथे आमा फर।
‎रुख के पाना हरियर-हरियर।।
‎पिंयर-पिंयर आमा दिखथे।
‎हाट-बाट मा अब्बड़ बिकथे।।
‎आमा देखत मुँह मा पानी।
‎काँट-काँट के खाबो चानी।।
‎आमा फर के आये राजा।
‎खाबो खट्टा-मीठा ताजा।।
‎कहिथे गरिमा, सुन गा कक्का।
‎मोला देवव आमा पक्का।।
‎रुख मा चढ़गे झट कक्का हर।
‎टोर गिरावय ओ पक्का फर।।
‎झट-झट बिनके धर आमा फर।
‎कच्चा-पक्का मा झोला भर।।
‎हाँसत-गावत घर ला आइन।
‎आमा खाके सब मुस्काइन।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू 
‎गाँव - गिधवा, जिला- बेमेतरा

Sunday, 2 August 2026

आइस मौसम जाड़ा*

‎*आइस मौसम जाड़ा*
‎सुघ्घर आइस मौसम जाड़ा।
‎चारो डहर ओस के माड़ा।।
‎भोर बिहनिया मोती चमकत।
‎सुरुज देव निकरे ता दमकत।।
‎फुलवा जाड़ा मा मुस्कावत।
‎रंग-बिरंगा सब ला भावत।।
‎चिरई-चिरगुन बइठे ठुठरत।
‎सबो जीव जाड़ा मा कुड़कत।।
‎हाथ गोड़ हर काँपत कसके।
‎दाँत किटकिटावत हे जमके।।
‎सुरुज देव गरमी बगरावत।
‎देखत-देखत जाड़ा भागत।।
‎सुन ले बहनी, सुन ले बेटी।
‎जाड़ कपावत खोलव पेटी।।
‎कथरी, चद्दर, शाल, रजाई।
‎स्वेटर, टोपी, ओढ़व भाई।।
‎तापव भूर्री ला मन भर ले।
‎जाड़ा भगाव सब्बो तन ले।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू 
‎गाँव - गिधवा, जिला- बेमेतरा

‎हमला दवँ वरदान‎(हेम के सरसी छंद)‎

‎बाल कविता
‎हमला दवँ वरदान
‎(हेम के सरसी छंद)
‎नान्हे-नान्हे लइका हावँन,
‎हमला दवँ वरदान।
‎आसा लेके आये हावँन, 
‎सुनव मोर भगवान।।
‎मन मा सुम्मत समरसता के, 
‎दीया ला दवँ बार।
‎मेटव मन के जमे मइल ला,
‎दूर करव अँधियार।।
‎हमरो मन विश्वास जगाके,
‎हिम्मत भरव अपार।
‎मानवता रग-रग मा भर के,
‎एही दवँ उपकार।।
‎होवय झन गलती हमरो ले,
‎मन के हावँन साफ।
‎नान्हे-नान्हे लइका हावँन,
‎गलती करहूँ माफ।।
‎रचनाकार : हेमलाल साहू
‎ग्राम : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

Saturday, 1 August 2026

‎हेम के सरसी छंद *मया के डोर*

‎हेम के सरसी छंद
‎मया के डोर
‎बाल कविता
‎नान्हे-नान्हे लइका हावन, बनबो पहरेदार।
‎बापू के रद्दा मा चलबो, लाबो नव उजियार।।
‎गौतम बुद्ध ले दया सीखव, पावव सत्य गियान।
‎भगत सिंह जस बनके संगी, रखबो भारत मान।।
‎मिलके समरसता बगराबो, जोड़ मया के डोर।
‎मया-दया ला हमन बाँटबो, देस के सबो छोर।।
‎हरियर लुगरा ला पहिराबो, हँसही धरती मोर।
‎जंगल-झाड़ी मन मुसकाही, फुलही जम्मो ओर।।
‎सबो डहर खुशहाली रइही, चिरई मन के सोर।
‎गाँव-गाँव ला सरग बनाबो, बगराबो अंजोर।।
‎रचनाकार : हेमलाल साहू
‎गाँव : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

‎बरखा रानी के रंग (हेम के सार छंद)

‎बाल कविता
‎बरखा रानी के रंग (हेम के सार छंद)
‎करिया-करिया बादर देखत
‎हाँसत हे जिनगानी।
‎सबके मन मा आस जगत हे,
‎आवत बरखा रानी।।
‎पानी देख मेचका टर्रय,
‎सुख के देय निशानी।
‎रुनझुन-रुनझुन पानी आथे,
‎बढ़िया होय किसानी।।
‎गावत सुघ्घर गीत ददरिया,
‎बैठ किसान दुआरी।
‎सावन-भादो महिना आगय,
‎छाय घपट अँधियारी।।
‎चंदा सूरज लुका छुपी ला,
‎खेलँय पारी-पारी।
‎छावय जग मा घुमड़-घुमड़ के,
‎बदरी कारी-कारी।।
‎उछलत कूदत नाचत-नाचत,
‎करँय तमासा मछरी।
‎झूमर-झूमर डोरी नाचत,
‎पिटय केकड़ा डफरी।।
‎झींगुर सोर मचावत हावय,
‎घोंघी खेलँय घाँदी।
‎चारो कोती स्वागत करथे,
‎झूम-झूम के काँदी।।
‎टपटप-टपटप पानी गिरथे,
‎चुहथे खपरा छानी।
‎तरिया-नदिया होय भरावर,
‎सुघ्घर हे जिनगानी।।
‎पहिरे धरती हरियर लुगरा,
‎लाय नवा खुशहाली।
‎चिरई-चुरगुन चहकत नाचय,
‎देखत बड़ हरियाली।।
‎लहलहात हे खेत-खार मन,
‎किरपा बरखा रानी।
‎हेम कहँय संवारव धरती,
‎ऐही धन के दानी।।
‎✍️ रचनाकार : हेमलाल साहू
‎गाँव : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
‎शब्दार्थ :
‎डोरी= "साँप, घाँदी=घूमना, काँदी= घास,मेचका = मेंढक

Sunday, 26 July 2026

‎मुसवा-बिलई के लड़ई

‎मुसवा-बिलई के लड़ई
‎मुसवा-बिलई ठनगे लड़ई।
‎बिलई ऊपर मुसवा झपई।।
‎मुसवा कहिथे, "मौसी बिलई!
‎जो जीतय, ओ खावय मलई।।"
‎बिलई कहिथे, "आ रे दाऊ!
‎हार जबे ता तोला खाऊ।।"
‎मिलके खेलय गिल्ली-डंडा।
‎मुसवा रचिस नवा हथकंडा।।
‎बिलई डंडा घुमइस भारी।
‎गिल्ली उड़के घुसगे बारी।।
‎गिल्ली खोजत मुसवा भागिस।
‎ओकर पाछू बिलई आगिस।।
‎मौका पा जा खुसरे बिल मा।
‎बिलई देखत रहिगे तिर मा।।
‎गिल्ली-डंडा के जुग टुटगे।
‎मुसवा हर बिलई ले छुटगे।।
‎रचनाकार: हेमलाल साहू
‎ग्राम: गिधवा, जिला: बेमेतरा

‎हेम के हास्य कविता — "बिक्कट भुलहा बबा"‎

‎हेम के हास्य कविता — "बिक्कट भुलहा बबा"
‎हमर बबा हे बिक्कट भुलहा, घर के पहरादार।
‎चश्मा पहिरे चश्मा खोजय, सबला देय पुकार।।
‎मेछा अइठत तेवर देवय, बनथे बड़ सरदार।
‎जेबे भीतर चाबी रहिथे, छानय घर-कोठार।।
‎बड़का मुसवा मार गिराइस, बनगे बड़का शेर।
‎काँधा ऊपर गमछा धरके, गमछा खोजय फेर।।
‎दाई कहिस नून ले आबे, नाती ला ले साथ।
‎नून के जगा चीनी लेलिस, दाई धरिसे माथ।।
‎बबा पटफटी लेके निकरिस, जब्बर झाड़य शान।
‎एक जगा मा छोड़ पटफटी, खोजय हो हलकान।।
‎मोबाइल ला दाई ला दे, खोजत घर भर आय।
‎दाई धर मोबाइल बइठे, घर भर हाँसी छाय।।
‎पनही पहिरे ठसक दिखावय, बनके राजा भोज।
‎पनही पहिरे पनही खोजय, घर भर हाँसी रोज।।
‎जब्बर छाती, ऊँचा काठी, बड़ हिम्मतहा आय।
‎हाथे लाठी धरके पूछय – "लाठी कहाँ मढ़ाय?"।।
‎रोज नवा किस्सा रच देवय, हाँसय घर-परिवार।
‎हमर बबा हे बिक्कट भुलहा, रखथे मया-अपार।।
‎रचनाकार - हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 

Friday, 24 July 2026

‎बरखा रानी के नखरा

‎बरखा रानी के नखरा
‎बरखा रानी नखरा मारत, 
‎कूदत-नाचत आत।
‎जस छाता धर तस भींजोवत,
‎देख-देख इतरात॥
‎चप्पल पहिरे निकरिन बाहिर,
‎चिखला धरिलिस पाँव।
‎सरले फिसलिन हाँसिन जम्मो,
‎देखत रहिगे गाँव।।
‎सड़क छोटकुन नदिया बनगे,
‎पानी बहय अपार।
‎मोटर-गाड़ी पहिया थमगे,
‎धकियावय सब यार।।
‎नरवा नदिया मस्ती मारय,
‎बाँधा भरगे आज।
‎बरखा कहिस – "मोर दिन आइस",
‎करहूँ कसके राज।।
‎कपड़ा धोके डारिन बाहिर,
‎बरखा देइस मात।
‎घमुआ आके झाँकिस थोकिन,
‎फेर गिरिस बरसात।।
‎हेम कहिस सुन बरखा रानी,
‎थोरिक धरव धियान।
‎बरखा हँसके कहिस – "मोर बिन,
‎कइसे होही धान?"।।
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)
‎धरती कोरा मा बसे, अँचरा ओढ़य सोय।
‎जतका खोदे ओतके, बाढ़त बड़का होय।।
‎आँखी मा दिखथे कहाँ, डार-पान हालाय।
‎हाथे नइ आवय कभू, सबो डहर बगराय।।
‎दुब्बर पातर नानकुन, हवा पेट फूलोय।
‎रंग बिरंगा देख के, लइका मन खुश होय।।
‎बरखा थमय अगास मा, सात रंग मुसकाय।
‎धरती अगास बीच मा, पुलिया कौन बनाय।।
‎आँखी नइहे फेर ओ, नाक-कान टिक जाय।
‎धुँधला नजर सुधार के, दुनिया साफ देखाय।।
‎लोहा-प्लास्टिक के बने, मुड़ ऊपर बइठाय।
‎बाइक वाले संग रहि, ओकर जान बचाय।।
‎हवा संग उड़ते फिरे, आँखी मा गड़ जाय।
‎पानी पाके हाथ मा, चिखला बन लफटाय।।
‎हरियर रहिथे रूप हा, डारा भर लटकाय। 
‎पाके भुरुवा होय के, मुँह मा पानी लाय।।
‎माटी पानी संग मा, कसके पकड़ बनाय।
‎ईटा-पथरा जोड़ के, घर-दुआर ठाढ़ाय।।
‎बिना तेल के रातभर, उजियारा बगराय।
‎खुद जरके ओ छोट हो, ओकर नाव बताय।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा 

हेम के दोहे (बाल जनऊला–9)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–9)


‎मुँह दाँत जीभिया नहीं, काया पोंडा होय।

‎फूँक देत ता राग दे, बिना फूँक चुप सोय।।


‎ऊपर हे झबरा जटा, काया कठुआ पोठ।

‎कारी आँखी तीन ठन, भीतर गूदा रोठ।।


‎पानी दाना खाय नइ, पखना के जे पूत।

‎टकरावत चिनगी झरे, सुलगा देवय सूँत।।


‎उज्जर काया खोखला, फूँक परत हुंकार।

‎मंदिर भर गूँजत उठय, मंगल करत पुकार।।


‎दू अँगरी हे एक मुँह, चलथे एक्के साथ।

‎दहकत धरके अंगरा, मनखे बचाय हाथ।।


‎कुआँ नहीं पानी झरे, घाम काम ले गार।

पीये कोनो जन नहीं, हवा पाय ले हार।।


‎चलय नहीं दौड़य नहीं, बिना पाँव पहुँचाय।

‎गाँव-शहर ला जोड़ के, जग ला छोट बनाय।।


‎डिक्टो मनखे कस लगे, फेर चले ना साँस।

‎पहिरे फटहा कोट ला, काया लउठी बाँस।।


‎दुरिहा जावय पाँव बिन, संदेसा पहुँचाय। 

‎ओकर मुँह नइहे तभो, जम्मो बात बताय।।


‎करिया धूसर रूप धर, भागत चढ़य अगास।

‎आँखी मा पानी भरे, खांसत निकले साँस।।


‎उत्तरमाला


‎🎶 बंसी (बासुरी)• 🥥 नरियर (नारियल )• 🪨 चकमक  • 🐚 शंख • 🔥 चिमटा • 💦 पसीना • 🛣️ रद्दा (सड़क )• 🌾 पुतला • ✉️ पाती (चिट्ठी )• 🌫️ धुआँ


‎रचनाकार -हेमलाल साहू

‎चिरई के गाँव - गिधवा, जिला-बेमेतरा



🌼 हेम के दोहे (बाल जनऊला–8) 🌼

🌼 हेम के दोहे (बाल जनऊला–8) 🌼

दुब्बर पतली कमरिया, तीखा ओकर धार।
लकर-धकर ले काट दे, ठाढ़े धान जुआर।।

गोड़ हाथ अउ मुँह नहीं, बाँधे सौ-सौ गाँठ।
बइला बोझा खाट संग, गाढ़ा रहिथे साँठ।।

तीन जीव के संग ले, चलथे एक्के ओर।
खरर-खरर ले जोत के, धरती सीना फोर।।

पतली-पसली बाँस के, गूँथय गोल लपेट।
ऊपर ढक्कन दाब के, भीतर रखय समेट।।

दूठन डंडा गोड़ जस, पइदान ले बनाय।
एक्को पाँव उठाय ना, सबला सरग चढ़ाय।।

सौ-सौ दुवार एक घर, सबो रहँय परिवार।
फूलन रसा बटोर के, भरँय अपन भंडार।।

बिन करघा बिन सूत के, गजबे कारीगार।
तिनका-पाना जोड़ के, बुन देवय घरबार।।

डारा ऊपर बइठ के, बदलत रंग हजार।
फेंके झटले जीभिया, फटले धरे शिकार।।

चोंचकु मुँह तन नानकुन, हिम्मत रखय अपार।
ठक-ठक रुख मा छेद कर, पावय अपन अहार।।

बादर ले पानी गिरे, फुटथे छतरी तान।
ना बीजा रोपा लगे, करले तँय पहिचान।।

🌈 उत्तरमाला 🌈

❶ 🔪 हँसिया • ❷ 🪢 रस्सी • ❸ 🚜🐂 नागर (हल) • ❹ 🧺 झाँपी • ❺ 🪜 निसैनी (सीढ़ी) • ❻ 🐝🍯 मधुमक्खी के छत्ता • ❼ 🐦🪺 बया चिरई के घोंसला • ❽ 🦎 गिरगिट • ❾ 🐦🌳 कठखोलवा (कठफोड़वा) • ❿ 🍄 पिहरी (कुकुरमुत्ता)

✍️ रचनाकार – हेमलाल साहू
📍 चिरई के गाँव – गिधवा, जिला – बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

Thursday, 25 June 2026

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–7)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–7)
‎चौमासा किंजरत फिरे, पुसवा दुबके जाय।
‎आहट पावय ता खड़े, मुड़ी उठा फुसकाय।।
‎माटी के तन पेट मा, आगी ला सुलगाय।
‎लकड़ी छेना डार ता, लपटा उप्पर जाय।।
‎दू काया मुँह एकठन, दाना खावय नीस।
‎घर के कुरिया बैठ के, सबला घड़घड़ पीस।।
‎शीशा के घर मा रहे, रतिहा कर उजियार।
‎जिनगी बाती-तेल हे, ओकर बिन अँधियार।।
‎एक्ठो मुँह बिन दाँत के, दाना खाय हजार।
‎अपन पेट भर फेंकथे, सबला छाँट निमार।।
‎पथरा ले पथरा दबा, मिरचा ला रोवाय।
‎लादा पोटा एक कर, सुघ्घर स्वाद बढ़ाय।।
‎काया गहरा गोल हे, धरय धान भरमार।
‎थुथना-थुथना मार के, भूसा फेक उतार।।
‎मगरा कस काया हवे, बइठे परछी पार।
‎दबक-दबक के पाँव ले, भूसा देय उतार।।
‎बिन इंजन अउ तेल के, दू संगी ले जूर।
‎लकड़ी के काया बने, चलथे कोसो दूर।।
‎लोहा के दाँता गड़ा, धरती छाती चीर।
‎रेंगय ओरी ओर ले, खींचे खड़ा लकीर।।
‎उत्तरमाला : 🐍 नाग (साँप) | 🔥 चूल्हा | ⚪ जाँता (हाथ चक्की) | 🏮 लालटेन | 🎋 सूपा (सूप) | 🪨 सिल-लोढ़ा (सिलबट्टा) | 🌾 ओखली (उखर) | 🌾 ढेंकी | 🐂 बैलगाड़ी | 🌾 नागर (हल)
‎रचनाकार – हेमलाल साहू
‎चिरई के गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा

Wednesday, 24 June 2026

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–6)‎

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–6)
‎सादा कपड़ा ओढ़ के, धरथे साधू भेस।
‎पानी भीतर झाँकके, झटले धर लीलेस।।
‎गलती ला गप्पल जथे, कबो नहीं चिचियाय।
‎कागज उप्पर फेर दे, सबो साफ हो जाय।।
‎घर के आगू ठाढ़ हे, चौड़ा सीना तान।
‎पहरा देवय रात दिन, का हे नाव सुजान।।
‎सोना जइसन रंग हे, किसान रखय समेट।
‎पूजा करय किसान मन, भरथे कोठी पेट।।
‎रतिहा परदा फार के, लावय नवा बिहान।
‎तोर बिना जग कुछु नहीं, बूझव नाव सियान।।
‎पानी पीके जीय थे, बिन पानी अइलाय।
‎पटकू ला ओढ़े हरा, अँगना भर मुस्काय।।
‎बड़े-बड़े ले मूछ हे, छोट जीव के काल।
‎दबके बइठे ताकथे, धीरज चतुरा चाल।।
‎करिया काया नानकुन, चोककु लम्बा दाँत।
‎कुतर-कुतर के धान खा, ची-ची करथे बात।।
‎लकड़ी रस्सी देह हे, एक चलय ना पाँव।
‎लेटत भर ले नींद दे, बूझव ओकर नाव।।
‎नइ उड़य ओ अगास मा, फेर पाँख हे चार।
‎फरफर-फरफर घूम के, देय पसीना मार।।
‎उत्तरमाला 
‎🐦 कोकड़ा (बगुला) | ✏️ मेटली (रबर) | 🚪 कपाट (दरवाजा) | 🌾 धान | ☀️ सूरज | 🌱 पौधा | 🐱 बिलई (बिल्ली) | 🐭 मुसवा (चूहा) | 🛏️ खटिया(खाट)| 🌬️ पंखा
‎रचनाकार – हेमलाल साहू
‎चिरई के गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा

Tuesday, 23 June 2026

‎🌟 हेम के दोहे (बाल जनऊला–5) 🌟‎

‎🌟 हेम के दोहे (बाल जनऊला–5) 🌟

‎कागज उप्पर नाचके, पोकय मस के लीक।
‎अपन पेट खाली करे, नाव बतालव ठीक।।

‎हरियर लुगरा ओढ़ के, ठाड़े दिन अउ रात।
‎जेठ घाम मा छाँव दे, सबके करय सहात।।

‎रतिहा फूलय डार मा, टप टप झरय बिहान।
‎महर महर ममहाय ले, दुरिहा ले पहिचान।।

‎एक पेड़ सीधा खड़े, छूये जाय अगास।
‎दुब्बर पातर ये रहे, आवय कामें खास।।

‎झब्बू पूँछ उठाय के, कूदय नाचय डार।
‎करिया धारी पीठ मा, करथे चिर्र-पुकार।।

‎काया हरियर रंग के, टप-टप कूदत जाय।
‎पानी गिरथे सनसना, टरर-टरर नरियाय।।

‎धरती भीतर घर करे, मुँह ऊपर हे खोल।
‎प्यासा आके तीर मा, पानी पाय अमोल।।

‎काया हरियर लाल मुख, गुरतुर बोली बान।
‎मनखे जइसन गोठिया, बूझव नाम सुजान।।

‎रंग बिरंगी पाँख ले, फूल फूल मंडराय।
‎रस चूसे मुँह नानकुन, घूम घूम इतराय।।

‎पानी भीतर घर करे, बिन पानी मर जाय।
‎आँखी खोले रात दिन, पलक नहीं झपकाय।।

‎उत्तरमाला : कलम 🖋️ | रुख (पेड़)🌳 | महुआ 🌼 | बाँस 🎋 | गिलहरी 🐿️ | मेचका (मेढ़क)🐸 | कुँआ 💧 | मिट्ठू (तोता)🦜 | तितली 🦋 | मछरी (मछली)🐟

‎रचनाकार – हेमलाल साहू
‎चिरई के गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा




Monday, 22 June 2026

हेम के दोहे (बाल जनऊला 4)

‎ हेम के दोहे (बाल जनऊला 4) 
‎डेरा रहय अगास मा, पाँव बिना चल जाव।
‎काँवर मा पानी भरे, गाँव-गाँव बरसाव।।
‎लेवय जनम पहाड़ मा, पालय पोसय गाँव।
‎भुइयाँ मा इतरात चल, सागर मा मिल जाव।।
‎करिया टूरा नानकुन, पीसत चकना चूर।
‎नाक चढ़य ता छींक दे, महिमा हे भरपूर।।
‎दाँत नहीं पर काट दे, झटकुन देवय फाँक।
‎दू पल्ला बिन सून हे, बूझव थोकुन झाँक।।
‎दुब्बर पातर नानकुन, मुँह मा चोखा धार।
‎लकर धकर ले कूद के, कपड़ा कर तैयार।।
‎रतिहा बुग-बुग ले बरय, रुख राई मा बास।
‎बिन बाती बिन तेल के, जगमग करथे खास।।
‎करिया काया ला धरे, कउवा जस झन मान।
‎बइठे रुख के डार मा, गावय गुरतुर गान।।
‎हीरा अउ मोती नहीं, भिनसरहा के हार।
‎माड़ा हरियर पान मा, फबथे बड़ सिंगार।।
‎बिन आगी उठथे धुआँ, भिनसरहा ले छाय।
‎सुरुज ददा ला देख के, लटपट सरकत जाय।।
‎माटी ले काया बनय, सुग्घर गोल मटोल।
‎सस्ता फ्रिज गरीब के, पानी रखय अमोल।।
‎🌈 उत्तरमाला 🌈
‎❶ बादर (बादल) ❷ नदिया (नदी) ❸ बटुरा मरिच(काली मिर्च) ❹ कैंची ❺ सुई ❻ जुगनू ❼ कोयल ❽शीत (ओस) ❾ कुहरा (कोहरा) ❿ करसा(मटका)
रचनाकार – हेमलाल साहू
‎पक्षी विहार गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा

‎🌟 हेम के दोहे (बाल जनऊला 3) 🌟‎

‎🌟 हेम के दोहे (बाल जनऊला 3) 🌟
‎❶
‎लुगरा हरा लपेट के, धरथे भीतर सोन।
‎मुड़ मा भुरवा बाल हे, बता सखी ये कोन।।
‎❷
‎बाहर पथरा कस कड़ा, गूदा मीठ भराय।
‎डारा-डारा मा फरय, पक्का हर ममहाय।।
‎❸
‎माटी भीतर जा घुसे, पहिरे भुरवा खोल।
‎घर ला फोरव ता मिले, बीजा गुरतुर गोल।।
‎❹
‎उप्पर कपड़ा एकठन, भीतर परत हजार।
‎दूसर रोवय खुद कटे, देवय अब्बड़ झार।।
‎❺
‎रहय सबो एकेच घर, अपन हाथ ला जोर।
‎खोल उतारय ता दिखे, सादा दाँत निपोर।।
‎❻
‎काया रहिथे नानकुन, रेंगय बना कतार।
‎खाये बर कोठी भरय, जांगर खपय अपार।।
‎❼
‎आठ पाँव धर काम ले, बुनय सुई बिन जाल।
‎दरजी मानय हार ला, अइसन करय कमाल।।
‎❽
‎धरय पीठ घर लाद के, घूमय दिन अउ रात।
‎सुस्ता-सुस्ता रेंगथे, भावय बड़ बरसात।।
‎❾
‎फूल-फूल रस बीनथे, कुरिया रखय लपेट।
‎गुरतुर धन भंडार रख, जग ला करदय भेंट।।
‎❿
‎पहरा देवय रात के, घटय बढ़य हर रोज।
‎सुकवा संगे खेलथे, नाव हवय का खोज।।
‎✨🌈 उत्तरमाला 🌈✨
‎❶🌽 भुट्टा(मकई)• ❷🍈 बेल (बेल फल)• ❸🥜 मूंगफली • ❹🧅 गोंदली(प्याज)• ❺🧄 लसुन(लहसुन )• ❻🐜 चांटी(चींटी)• ❼🕷️ मेकरा(मकड़ी)• ❽🐌 घोंघी-घोंघा • ❾🐝 मधुमक्खी • ❿🌙 चंदा(चांद)
‎✍️ रचनाकार – हेमलाल साहू
‎🐦 🪺चिरई के गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा

Saturday, 20 June 2026

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला 2)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला 2)
‎रतिहा आवय काम मा, बटन मसक दे थोर।
‎रहिथे चुप अरझे परे, लावय बड़ अंजोर।।
‎नान-नान धर दाँत मा, सुलझा देवय केस।
‎उलझन ला दुरिहा भगा, बूझव येकर भेस।।
‎करिया काया ला धरे, पहिरे उप्पर कोट।
‎उज्जर पन्ना ला भरे, होवत जावय छोट।।
‎मुड़ मा नाचे पाँव बिन, तन के तानय तार।
‎बरखा चाहे घाम हो, बन जावय रखवार।।
‎झूठ कपट रखथे कहाँ, सच के देथे साथ।
‎जइसे ला तइसे दिखा, धरय जेन हा हाथ।।
‎नान नान कड़गी जुरे, जेकर पाँव हजार।
‎कचरा दुश्मन तोर ये, खेदय घर के पार।।
‎दून्नो संगी एक हो, जावय खेती खार।
‎काँटा खूँटी ले बचा, सेवा देय अपार।।
‎पोथी कापी ला भरे, अपन पेट भंडार।
‎नोनी बाबू संग चल, बनके पक्का यार।।
‎दूठन चक्का ले चले, कसरत के ये खेल।
‎पैसा हर बांचय घलो, अपन पाँव ले पेल।।
‎नइहे मुँह ता बोलथे, निकले तोर पुकार।
‎टन-टन करके सोर दे, हो जावय तैयार।।
‎उत्तर : १. बल्ब (बिजली बत्ती) 💡 | २. कंघी 🪮 | ३. पेंसिल ✏️ | ४. छाता ☂️ | ५. आईना (दर्पण) 🪞 | ६. झाड़ू 🧹 | ७. पनही-चप्पल 🩴 | ८. बस्ता 🎒 | ९. साइकिल 🚲 | १०. घंटी 🔔
‎रचनाकार - हेमलाल साहू
‎चिरई के गाँव - गिधवा, जिला बेमेतरा 

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला-1)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला-1)
‎नाच नचावय अंगरी, बड़का हवय सुजान।
‎दुनिया भर के गोठ ला, पहुँचाय तोर कान।।
‎संग दिखे अंजोर मा, फेर चलय ना साँस।
‎हाथ लगा आवय नहीं, अंधियार मा नास।।
‎बिन संगी आधार ना, जोड़ी बिन बेकार।
‎पहरा देवय बैठ के, असली पहरेदार।।
‎सूंघ-सूंघ पहिचान ले, पावय लाड दुलार।
‎चोर उचक्का देख के, ओला करय फरार।।
‎एक गोल डिबिया धरय, बारहठन के अंग।
‎तीन सिपाही सँग चले, समय बतावय रंग।।
‎पन्ना अपन समेट के, भर रखथे भंडार।
‎मोती दाना खोज के, मन के दीया बार।।
‎अपन पसीना सींचथे, उठथे होत बिहान।
‎लावय हरियर सोनहा, कोन हरे पहिचान।।
‎हरियर थाली ले भरे, पहिरय बाली सोन।
‎चार मुड़ा ले डाड़ हे, बता सखी ये कोन।।
‎एक जगे दूजा सुते, अपन चढ़ावय रंग।
‎जिनगी के गाड़ी चले, रहय कभू ना संग।।
‎नान्हे दाना पेट मा, धर रखथे जग छाँव।
‎बड़का हो फल-फूल दे, बूझव संगी नाँव।।
‎उत्तर:-1. मोबाइल, 2. छइहाँ (परछाई), 3. तारा-कूची (ताला-चाबी), 4. कुकुर (कुत्ता), 5. घड़ी, 6. पोथी (किताब), 7. किसान, 8. खेती-खार (खेत-खलिहान), 9. दिन-रात, 10. बीजा (बीज)
‎रचनाकार - हेमलाल साहू
‎चिरई के गाँव - गिधवा, जिला बेमेतरा 

Wednesday, 17 June 2026

‎खेलँय संगी (चौपाई छंद)‎

‎खेलँय संगी (चौपाई छंद)
‎खेलँय संगी बाँटी भौरा।
‎राउत पारा, दाऊ चौरा।।
‎गोल गोल ले भौरा नाँचय।
‎देख देख के लइका हाँसय।।
‎बगड़ू बल्ला खिंचे रस्सी।
‎कोन जीतथे रस्सा कस्सी।।
‎देखय गंगा बंटी बल्लू।
‎बैठे तीर मा कुकुर कल्लू।।
‎घाम चढ़े ले खेलँय फुगड़ी।
‎लइका सकलाइन बन जुगड़ी।।
‎खेल कबड्डी पीटय ताली।
‎दाँव परे ले चिन्हा लाली।।
‎संझा बेरा चोर-सिपाही।  
‎लुका-छुपी मा माजा आही।।
‎खेल लंगड़ी अंधा कानी।
‎गाँव गली के खेल निशानी।।
‎रेस टीप खेलँय पचरंगा।
‎ठप्पा बजा भाग ले गंगा।।
‎घांदी मूंदी खेल सहेली।
‎खेल खेल मा पूछ पहेली।।
‎खेलँय कोलाल धरे डंडा।
‎नवा-नवा खेले के फंडा।।
‎खोखो खेलँय मन भर भागँय।
‎बइठे खड़े दाँव ला पालँय।। 
‎डंडा मारय उड़थे गिल्ली । 
‎जइसे जाये जहाज दिल्ली।।
‎सगली भदली खेल सजावँय।
‎पुतरी-पुतरा बिहा रचावँय।।
‎मोबाइल के छोड़ खुमारी।
‎खेल बने असल संगवारी।।
‎खेल खेल मा होवय योगा।
‎तन मन होवै पोठ निरोगा।।
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला -बेमेतरा 

Saturday, 13 June 2026

जुगनू राजा

जुगनू राजा

हमर गाँव के जुगनू राजा।
कहाँ लुकागे दउड़त आजा।

छोटे नाक-कान हे आँखी।
सुग्घर हावय दू ठन पाँखी।।

पहली रोज घूम के जावच।
मया अँजोरी के बगरावच।।

अब डर्रा मन साँपे नाचय।
मोबाइल मा उजास बाँचय।।

नइ समझेन तोर पीरा ला।
जहर डार मारे कीरा ला।।

काटे जंगल झाड़ी भारी।
उजड़त हे तोर घर दुवारी।।

छाये घर तोर निराशा हे।
आही अंजोर अब आशा हे।।

फेर चमक हू हरियर पीला।
अपन दिखाहू गज्जब लीला।।

रचनाकार- हेमलाल साहू
गांव - गिधवा, जिला - बेमेतरा

Friday, 5 June 2026

साइकिल

पहली रहिस साइकिल, घर के शान।

‎रहय अपन घर के ओ, बन पहिचान।।


‎दीदी नोनी बाबू, सबो सियान।

‎दाई बबा चलावय, सबो जवान।।


‎कम खर्चा पानी मा, चलय गुजार।।

‎दौड़य गली खोर अउ, सब संसार।।


‎ट्रिन ट्रिन बजाय घंटी, देय धियान।

‎लान साइकिल लेवय, काम किसान।।


‎पगडंडी मा भागय, बड़ रफ्तार।

‎गाँव शहर ला घूमे, पैडिल मार।।


‎एक एक पैडिल के, खूब धमाल।

‎तोर बना सेहत ला, करय कमाल।।


‎डीजल तेल के नहीं, बनय गुलाम।

‎मिहनत बदला सेहत, मिलय इनाम।।


‎बिना प्रदूषण दौड़ा, इहि जग सार।

‎चला साइकिल करलव, मया दुलार।।


‎रचनाकार - हेमलाल साहू

‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा



Sunday, 31 May 2026

‎हेम के कुण्डलियाँ (सच)‎

सच बोली मा रूठथे, झूठन जग पतियाय।

‎पर हेमलाल सच कहे, चाहे जिवरा जाय।।

‎चाहे जिवरा जाय, साँच बोली सुखदाई।

‎झूठ लबारी तोर, कभू टीकय ना भाई।।

‎गुनके चुनके बोल, लगालव सच के चोली।

‎अपने स्वारथ छोड़, सदा सच बोलव बोली।।

‎- हेमलाल साहू

गाँव- गिधवा, जिला बेमेतरा


Wednesday, 27 May 2026

‎*सीखव गिनती*‎

सीखव गिनती

‎आवव संगी सीखव गिनती।

‎मुनिया बबलू करथे बिनती।।

‎एक मया के ममता दाई।

‎दूध पान मा हवय भलाई।।

‎दू आँखी ले देखे मुनिया।

‎रंग बिरंगी हावय दुनिया।।

‎तीन रंग मा सजे तिरंगा।

‎देश प्रेम अउ हे मन चंगा।।

‎चार मास के बरसा पानी।

‎गाँव-गाँव मा करे किसानी।।

‎पाँच उंगरी एक हथेली।

‎मया-दया ला बाँट सहेली।।

‎छह ऋतु आवय बारी-बारी।

‎अपन रंग ले धरती सारी।।

‎सात सुरों मा गीत बनालव।

‎पेटी तबला संग बजालव।।

‎आठ पाँव के मकड़ी रानी,

‎जाल बुनय सारी जिनगानी।।

‎नौ दुवार के हावय काया।

‎बसथे उहाँ मोह अउ माया।।

‎दस उँगरी दू हाथ लगालव।

‎एक संग ले काम करालव।।

‎गिनती सीखव ज्ञान बढ़ावव।

‎पढ़-लिख के जिनगी चमकावव।।

‎-हेमलाल साहू

‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा

‎विष्णु पद छंद‎‎ नोनी‎‎ बाल कविता‎

‎विष्णु पद छंद ‎ ‎नोनी ‎ ‎बाल कविता ‎ ‎हमरो घर के नोनी हावय, अड़बड़ गा चतुरी। ‎बात सबो के मानै चुपकन,  काम करय बपुरी।। ‎ ‎नाप तौल मा अव्वल ह...

सबले ज्यादा पढ़े गिस