गिधवा के गाँव (सरसी छंद)
हवय शहर ले कतका बढ़िया,
गिधवा के रे गाँव।
माटी-खपरा घर सुग्घर,
मया भरे हर ठाँव।।
सुरुज देव के होत बिहनिया,
जगमग होवय गाँव।
हरियर-हरियर डारा-पाना,
रुखराई के छाँव।।
चिरई-चुरगुन घूमत हावय,
डेना अपन पसार।
अब्बड़ निक लगथे सबला रे,
तरिया-नदिया पार।।
जिहाँ किसानी मा जिनगानी,
सुग्घर खेती-खार।
माहामाया दाई देवत,
अन्न-धन्न भंडार।।
छोटे-छोटे लगथे बढ़िया,
जिहाँ हॉट-बाजार।
तौल-मोल करके ले ले तँय,
सबला छाँट-निमार।।
दाई, काकी, दादी, बहिनी,
सबके मया-दुलार।
बाबू, कका, बबा अउ भैया,
हिम्मत देय अपार।।
समरसता के दीया बारय,
दूर करँय अँधियार।
भेद-भाव ला दूर भगावय,
बाँधय सुमता पार।।
बाबू कहिथे बबलू रोशन,
महिमा गावत जावँ।
सबले सुग्घर हावय बेटा,
गिधवा के रे गाँव।।
रचनाकार -हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला- बेमेतरा
Sunday, 19 June 2022
गिधवा के गाँव (सरसी छंद)
Saturday, 18 June 2022
मोर ददा (बरवै छंद)
मोर ददा हे सुग्घर, सबले पोठ।
सुनवव भैया-बहिनी, मोरो गोठ।।
अपन मानथौं जेला, जस भगवान।
ओखर सीख मानथौं, बन इंसान।।
सच्चा हावय जेकर, मया दुलार।
विपदा मा खड़े रहय, बन रखवार।।
डाँटय फटकारय अउ, देवय साथ।
मोर जीत मा हावय, जेकर हाथ।।
हमला मेला ले जावय, हर इतवार।
हाँसत-खेलत पाथन, मया अपार।।
घर के सबले बड़का, हवे सियान।
खड़े रहय बइरी बर, सीना तान।।
ददा मोर बर हावँय, बड़का ज्ञान।
जेकर कारन मोरो, हे पहिचान।।
रचनाकार-हेमलाल साहू
गाँव-गिधवा, जिला बेमेतरा
मोर ददा (बरवै छंद) बाल कविता
मोर ददा हे सुग्घर, सबले पोठ।
सुनले चिंकी बनही, मोरो गोठ।।
अपन मानथौं जेला, जी भगवान।
पूजा करँव नेक मँय, बन इंसान।।
सच्चा हावय जेकर, मया दुलार।
छाती जब्बर हिम्मत, हवे अपार।।
डाँटय फटकारय अउ, देवय साथ।
मोर सफलता मा हे, जेकर हाथ।।
हम ला लेके जावय, पिकनिक टूर।
छोड़ लड़ाई झगड़ा, रहिथे दूर।।
घर के सबले बड़का, हवे सियान।
खड़े हवय बइरी बर, सीना तान।।
ददा मोर बर हावँय, विद्या ज्ञान।
जेकर कारण मोरो, हे पहचान।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-१
ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा
Tuesday, 14 June 2022
रक्तदान करलव (हेम के शंकर छंद)
रक्त करवल दान (हेम के शंकर छंद)
बात बतावँत हावय चुन्नी,
रक्त करलव दान।
दूर भगालँव मन के डर ला,
होय ना नुकसान।।
तन-मन हा तोर स्वस्थ रइही,
मोर कहना मान।
दे दँव जी मरीज ला सुघ्गर,
आप जीवनदान।।
कैंसर जस कतको बीमारी,
होय तन ले दूर।
एक बार करके देखव जी,
रक्तदान जरूर।।
भाई-चारा सुम्मत बगरय,
पूण्य हावय काज।
सबला समझावँय चुन्नी हा,
ठान लौ मन आज।।
काम सबो के आवँन संगी,
नेक बन इंसान।
रक्त दान कर जग मा बढ़िया,
काम करँव महान।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-1
ग्राम-गिधवा, जिला-बेमेतरा
Friday, 10 June 2022
*आजा बरखा रानी* (चौपाई छंद)
आजा बरखा रानी* (चौपाई छंद)
आजा-आजा बरखा रानी।
इहाँ गिरादे झटकुन पानी।।
सुरुज देव आगी फेंकत हे।
हरर हरर सब ला सेंकत हे।।
घाम जनावत हावय भारी।
लू मा उपजत हे बीमारी।।
तरिया नदिया सबो अँटागे।
कुँआ बावली सबो सुखागे।।
सुख्खा के आगी तड़पावत।
हैंडपंप घलो लड़खड़ावत।।
टैंकर आगू नाच लगावत।
पानी बर रोजे कल्लावत।।
बोरवेल के मोटर हाँफय।
पानी बिन मशीन हा काँपय।।
नल-जल के पाइप रोवत हे।
पेड़ काट मनखे सोवत हे।।
छोड़व बरखा आना-कानी।
तरसत हावँय सबो परानी।।
दिखही कब ये बदरी कारी।
आही कब तोर इहाँ बारी।।
आजा कँसके मार झकोरा।
हावँय सब ला तोर अगोरा।।
फेर मया बरखा बरसादे।
कारी-कारी बदरी ला दे।।
टर्र मेचका राग सुनाही।
खेती खार फेर हरियाही।।
तरिया नदिया उफान मारे।
दाई आँखी अँसुवन ढारे।।
रचनाकार-हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा
*परसा पेड़ (बरवै छंद)*
🌳 पसरा पेड़ (पलाश)
(बरवै छंद) बाल कविता
हावय बड़ उपयोगी, परसा पेड़।
पाबे खेत-खार के, सुघ्घर मेड़।।
आथे डारा-पाना, जड़-फर काम।
रोग भगाये तन ले, दै आराम।।
सबो जीव के बनथे, सुघ्घर ठाँव।
बचा घाम ले सब ला, देवय छाँव।।
बड़का-बड़का लावँय, पाना टोर।
तुनथें पतरी-दोना, कड़गी जोर।।
फर टोर कमाले तँय, पैसा चार।
औषधि बर बीकय, हाट-बजार।।
रुख के जर ले निकलै, कुंवर बाख।
बड़ गुणकारी हावय, एखर लाख।।
रचनाकार-हेमलाल साहू
गाँव-गिधवा, जिला बेमेतरा
*पेड़ बचाबो ( चौपाई छंद)*
*पेड़ बचाबो ( चौपाई छंद)*
ध्यान लगा के सुनले पिंकी।
सुघ्घर बात कहत हे चिंकी।।
मिलके आगू हाथ बढाबो।
दुन्नो बहनी पेड़ बचाबो।।
गाँव शहर ला हमन जगाबो।
घर घर हरियारी ला लाबो।।
निरमल पुरवइया बगराबो।
मिलके सुघ्घर पेड़ लगाबो।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-१
ग्राम गिधवा,जिला बेमेतरा
हमर देश (चौपाई छंद)
हमर देश (चौपाई छंद)
देश हमर हे सबले प्यारा।
दया मया अउ भाई चारा।।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई।
आपस मा हम भाई-भाई।।
जात-पात के करव विदाई।
आपस मा झन होय लड़ाई।।
सम-रसता के पाठ पढ़ावव।
सुमता के रद्दा ल बनावव।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक, सत्र-१
ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा
जूनी मेला (हेम के चौपाई छंद)
जूनी मेला
(हेम के चौपाई छंद)
बाल कविता
गाँव तीर मा जूनी मेला।
हवय भराये रेलम पेला।।
महिमा अपार जूनी दाई।
दरसन करंय लोग-लुगाई।।
सब्बो डहर लगे हें ठेला।
बेचँय अंगूर, सेब, केला।।
बाबू कहिथे सोना-मोना।
हाथ पकड़ ले झन जा खोना।।
हावय भारी भीड़ भड़क्का।
खावँय सब्बो धक्कम-धक्का।।
देखत मोना खई-खजेना।
बाबू ला कहिथे, "कुछु लेना।"
रंग-बिरंगी अउ चितरंगी।
फुग्गा लेवँय सब्बो संगी।।
झूलय खूब ढेलवा सोना।
खेलवना पाय मगन मोना।।
रचनाकार : हेमलाल साहू
ग्राम : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
*बात-बात ले सीख* (हेम के जयकारी छंद)
*बात-बात ले सीख* (हेम के जयकारी छंद)
ले लौ बात-बात ले सीख।
कोनो ला बोलव झन खीख।।
देश प्रेम के गाँवव गीत।
सब ला राख बना के मीत।।
दया -मया के नाता जोड़।
सदा लड़ाई झगड़ा छोड़।।
सुम्मत के मिल बाँधव पार।
सम-रसता के बगरय नार।।
बाँटव अपन ज्ञान ला जोर।
जग मा लावँव नवा अँजोर।
धरले मन साहस अउ धीर।
सूरज बन अँधियारी चीर।।
-हेमलाल साहू
छन्द साधक, सत्र -1
ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा
Thursday, 9 June 2022
खेलव संगी (चौपाई छंद)
खेलव संगी (चौपाई छंद)
खेलय संगी बाँटी भौरा।
राउत पारा, दाऊ चौरा।।
बगड़ू, बल्ला, दल्लू-बल्लू।
आय संग मा बंटी, लल्लू।।
खोखो खेल कबड्डी फुगड़ी।
सोना-मोना बन के जुगड़ी।।
रेस टीप खेलय पचरंगा।
दाम देत ले रोवय गंगा।।
घांदी मुंदी गिल्ली डण्डा।
नवा-नवा खेले के फंडा।।
खेल-खेल मा होथे योगा।
तन मन होवै पोठ निरोगा।।
-हेमलाल साहू
छन्द साधक, सत्र -1
ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा
आवाज (चौपाई छंद)
आवाज के दुनिया (चौपाई छंद)
झर-झर, झर-झर बहिथे झरना।
खन-खन खनके चूड़ी कँगना।।
सरर-सरर चलथे पुरवइया।
अँभा-अँभा बोलत हे गइया।।
मैं-मैं करथे छेरी-पठरू।
बाजे डम-डम शिव के डमरू।।
फड़-फड़ फड़थे कागज पुड़िया।
खिल-खिल हाँसय नान्ही गुड़िया।।
देख कुकर भौंकय भौं-भौं।
मोटर हारन बाजय पौं-पौं।।
म्याऊ-म्याऊ बोलय बिलई।
चूँ-चूँ चहकय नान्ही चिरई।।
टन-टन बजय स्कूल के घंटी।
भागय सरपट-सरपट बंटी।।
बादर गाजय घड़घड़-घड़घड़।
चमके बिजुरी कड़कड़-कड़कड़।।
रचनाकार : हेमलाल साहू
ग्राम : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
मीठा केला (हेम के चौपाई छंद)
मीठा केला (हेम के चौपाई छंद)
पक्का पक्का मीठा केला।
झगरू लावय भर भर ठेला।।
गाँव-गाँव बेचे बर जावय।
केला लेव-लेव चिल्लावय।।
सुनके चिंकी दौड़य सरपट।
केला ले बर आवय झटपट।।
चिंकी पूछय भाव बतावव।
दस रुपिया दरजन ले जावव।।
केला देखत मन ललचावय।
नाचय गावय मन हरसावय।।
माँगय केला चिंकी झप-झप।
ओला छिलके खावय गप-गप।।
रचनाकार : हेमलाल साहू
ग्राम : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
भालू भैया
बाल कविता
भालू भैया
हेम के त्राटक छंद
भालू कालू के सुन कहनी,
सुग्घर बैठ एक बाजू।
चम्पा, सोना, मोना, मुनिया,
डोलू, भोलू अउ राजू।।
हवय रंग मा करिया भुरुवा।
रहिथे सदा मगन भालू।
बड़का-बड़का पँजा हाथ के,
होसियार हावय कालू।।
मधुरस बड़ा चाव ले पीके,
ओखर पेट अघाथे।
रुख-राई ले टोर-टोर फर,
भोजन अपन बनाथे।।
नदिया-नरवा के पानी मा,
कूदत मगन हो नहाथे।
खेलत-कूदत जंगल मा,
जिनगी हँसत पहाथे।।
जंगल घूमय फिरय अकेला,
रुख छइँहा सुस्ताथे।
दुख पीरा मा भालू भैया,
मनखे जस भारी रोथे।।
रचनाकार : हेमलाल साहू
ग्राम : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
पेड़ लगावय (शंकर छंद)
पेड़ लगावय (शंकर छंद)
चुन्नी मुन्नी सोना बबलू,
होय झट तैयार।
धरके रापा कुदरी झउहाँ,
जाय तरिया पार।।
जुरमिल पेड़ लगावय बढ़िया,
घेर परिया मेड़।
साजा सरई आमा पीपर,
नीम अउ बर पेड़।।
करथे सब्बो मिल सँगवारी,
आज वादा एक।
हमन जतन करबो रुखवा के,
काम हावय नेक।।
काँटव झन ये रुखराई ला,
देत सुख के छाँव।
आवव अलख जगाबो मिलके,
शहर जम्मो गाँव।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-1
ग्राम गिधवा, जिला बेमेतरा
कहिथे पुस्तक
बाल कविता
कहिथे पुस्तक
(सरसी छंद)
कहिथे पुस्तक चिंकी, पिंकी,
बन जा साथी मोर।
पढ़ के मोला सुरता रखबे,
काम आँव मँय तोर।।
अनगिन बात समोय हवँव मँय,
दुनिया भर के ज्ञान।
पढ़त-पढ़त बन जाबे संगी,
तँय बड़का विद्वान।।
पन्ना-पन्ना मोर पलट के,
पढ़ के लेबे देख।
पाबे नाटक, कहनी, कविता,
सुघ्घर-सुघ्घर लेख।।
डॉक्टर, मास्टर अउ वकील बर,
मोर सहारा लेत।
दुनिया भर के मनखे मन ला,
बढ़िया सेवा देत।।
भगवद्गीता रामायण मँय,
चारो वेद पुरान।
रग-रग मा मोर बसे हावय,
आखर बन भगवान।।
गौरव गाथा मँय अतीत के,
सबो समाये काल।
पढ़के जानव भविष्य अउ
वर्तमान के हाल।।
मोबाइल युग मा झन करहूँ,
मोला टाल-मटूल।
पढ़-लिख के मोरो रख लेहूँ,
बचाय रखहूँ मूल।।
रचनाकार : हेमलाल साहू
ग्राम : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
Wednesday, 1 June 2022
ओस के बूँद (चौपाई छंद)
ओस के बूँद (चौपाई छंद)
चमक दमक जस हीरा-मोती।
होत बिहनिया चारो-कोती।।
रहिथें माड़ा काँदी पाना।
बनके सुघ्घर मोती दाना।।
रेंगे उघरा हो बिन चप्पल।
ओकर सबो रोग दै गप्पल।।
सुरुज देव जस बेरा टाँगे।
देख-देख ओला जा भागे।।
जल्दी का हे नाम बताना।
तोला देंहू खई खजाना।।
-हेमलाल सह
छंद साधक सत्र-१
ग्राम गिधवा, जिला - बेमेतरा
उल्लू (चौपाई छंद)
घुघु-घूँ करथें रतिहा उल्लू।
सुनके झट उठे कुकुर कल्लू।।
बड़का-बड़का आँखी भारी।
रतिया आवय घट अँधियारी।।
कतको मनखे डर मा काँपय।
पाछू भाग कुकुर हर हाँफय।।
भौं-भौं करके कुकुर भगाथे।
तब नींद सबो ला आ पाथे।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-1
ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा
*तितली रानी* (चौपाई छंद)
रंग बिरंगी तितली रानी।
घूमय फीरय पीयय पानी।।
सुघ्गर हावै सबले प्यारी।
दिखते जैसे राजकुमारी।।
फूल तीर मा रहिथे डेरा।
पता चले ना कहाँ बसेरा?
सबो फूल के रस ला चुहकय।
हवा संग उड़ उड़ के कुलकय।।
तितली लइका के मन भावय।
ओला अपन तीर जब पावय।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-1
ग्राम- गिधवा, जिला-बेमेतरा
गुड़िया रानी (चौपाई छंद)
गुड़िया रानी (चौपाई छंद)
गुड़िया रानी बड़े सियानी।
दूध-भात खा पीयय पानी।।
सबके हावय लाड-दुलारी।
सबले सुघ्घर राजकुमारी।।
दौड़-दौड़ के खेलय रानी।
करथे फेर अपन मनमानी।।
थप-थप पीटय सुघ्घर थपड़ी।
डफ-डफ बजाय धरके दफड़ी।।
छम-छम सुग्घर पायल बाजय।
ढम्मक-ढम्मक गुड़िया नाचय।।
ला-ला ला-ला कहिके गावय।
अम्मा-अम्मा कहि चिल्लावय।।
रचनाकार : हेमलाल साहू
ग्राम : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
नवटप्पा के झाँझ (हेम के पादाकुलक छंद)
झरझर झरझर झाँझे लागे,
दिन हा नवटप्पा के आगे।
सुरुज देव आगी बरसावे,
पाँव जरत भुइँया मा हावे
होत बिहनिया घाम जनाथे,
ठण्ठा जिनिस खूब मन भाथेे।
प्याज धरै सब घर ले जाथे,
नवटप्पा ले जौन बचाथे।
रस्ता मन हा परगे सुन्ना,
खोर गली झन जाबे मुन्ना।
कहिथे महतारी सुन दादू,
नवटप्पा कर देही जादू।।
झोले झाँझ लाय बीमारी,
धर लेबे तँय खटिया भारी।
रहिबे मझनिया घर द्वारी,
आवय नहीं झाँझ के पारी।
कर लेबे थोकुन उपकारी,
पेड़ लगाके घर अउ बारी।
नवटप्पा कमती हो जाही,
रुखराई हा झाँझ भगाही।
-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-1
ग्राम गिधवा, जिला-बेमेतरा
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