गुल्लू के गाँव (सरसी छंद) कतका बढ़िया हवय शहर ले गुल्लू के रे गाँव।। कच्चा-पक्का छाँही-खपरा, अलवा-जलवा ठाँव।। सुरुज देव के होत बिहनिया, जिहाँ परत हे पाँव। हरियर-हरियर डारा-पाना, रुखराई के छाँव।। चिरई-चुरगुन घूमत हावय, डेना अपन पसार। अब्बड़ निक लागे सबला रे, तरिया नदिया पार।। जिहाँ किसानी मा जिनगानी, सुग्घर खेती खार। माहामाया दाई देवत, अन्न-धन्न भंडार।। छोटे-छोटे लगथे बढ़िया, जिहाँ हॉट बाजार। तौल मोल करके ले ले तँय, सब ला छाँट निमार।। दाई, काकी, दादी, बनही, सबके मया दुलार। बाबू, कका, बबा अउ भैया, हिम्मत देत अपार।। समरसता के दीया बारय, दूर करँय अँधियार भेद-भाव ला दूर भगावय, बाँधय सुमता पार।। सबले सुघ्गर हावय बेटा, गुल्लू के रे गाँव। कहिथे बाबू, बबलू रोशन, कतका मँय दुहराँव।। -हेमलाल साहू छंद साधक सत्र -१ ग्राम-गिधवा, जिला-बेमेतरा।
हेम के छत्तीसगढ़ी बाल कविता