खेलँय संगी (चौपाई छंद)
खेलँय संगी बाँटी भौरा।
राउत पारा, दाऊ चौरा।।
गोल गोल ले भौरा नाँचय।
देख देख के लइका हाँसय।।
बगड़ू बल्ला खिंचे रस्सी।
कोन जीतथे रस्सा कस्सी।।
देखय गंगा बंटी बल्लू।
बैठे तीर मा कुकुर कल्लू।।
घाम चढ़े ले खेलँय फुगड़ी।
लइका सकलाइन बन जुगड़ी।।
खेल कबड्डी पीटय ताली।
दाँव परे ले चिन्हा लाली।।
संझा बेरा चोर-सिपाही।
लुका-छुपी मा माजा आही।।
खेल लंगड़ी अंधा कानी।
गाँव गली के खेल निशानी।।
रेस टीप खेलँय पचरंगा।
ठप्पा बजा भाग ले गंगा।।
घांदी मूंदी खेल सहेली।
खेल खेल मा पूछ पहेली।।
खेलँय कोलाल धरे डंडा।
नवा-नवा खेले के फंडा।।
खोखो खेलँय मन भर भागँय।
बइठे खड़े दाँव ला पालँय।।
डंडा मारय उड़थे गिल्ली ।
जइसे जाये जहाज दिल्ली।।
सगली भदली खेल सजावँय।
पुतरी-पुतरा बिहा रचावँय।।
मोबाइल के छोड़ खुमारी।
खेल बने असल संगवारी।।
खेल खेल मा होवय योगा।
तन मन होवै पोठ निरोगा।।
रचनाकार-हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला -बेमेतरा
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