🌟 हेम के दोहे (बाल जनऊला–5) 🌟
कागज उप्पर नाचके, पोकय मस के लीक।
अपन पेट खाली करे, नाव बतालव ठीक।।
हरियर लुगरा ओढ़ के, ठाड़े दिन अउ रात।
जेठ घाम मा छाँव दे, सबके करय सहात।।
रतिहा फूलय डार मा, टप टप झरय बिहान।
महर महर ममहाय ले, दुरिहा ले पहिचान।।
एक पेड़ सीधा खड़े, छूये जाय अगास।
दुब्बर पातर ये रहे, आवय कामें खास।।
झब्बू पूँछ उठाय के, कूदय नाचय डार।
करिया धारी पीठ मा, करथे चिर्र-पुकार।।
काया हरियर रंग के, टप-टप कूदत जाय।
पानी गिरथे सनसना, टरर-टरर नरियाय।।
धरती भीतर घर करे, मुँह ऊपर हे खोल।
प्यासा आके तीर मा, पानी पाय अमोल।।
काया हरियर लाल मुख, गुरतुर बोली बान।
मनखे जइसन गोठिया, बूझव नाम सुजान।।
रंग बिरंगी पाँख ले, फूल फूल मंडराय।
रस चूसे मुँह नानकुन, घूम घूम इतराय।।
पानी भीतर घर करे, बिन पानी मर जाय।
आँखी खोले रात दिन, पलक नहीं झपकाय।।
उत्तरमाला : कलम 🖋️ | रुख (पेड़)🌳 | महुआ 🌼 | बाँस 🎋 | गिलहरी 🐿️ | मेचका (मेढ़क)🐸 | कुँआ 💧 | मिट्ठू (तोता)🦜 | तितली 🦋 | मछरी (मछली)🐟
रचनाकार – हेमलाल साहू
चिरई के गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा
Tuesday, 23 June 2026
🌟 हेम के दोहे (बाल जनऊला–5) 🌟
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