Monday, 22 June 2026

हेम के दोहे (बाल जनऊला 4)

‎ हेम के दोहे (बाल जनऊला 4) 
‎डेरा रहय अगास मा, पाँव बिना चल जाव।
‎काँवर मा पानी भरे, गाँव-गाँव बरसाव।।
‎लेवय जनम पहाड़ मा, पालय पोसय गाँव।
‎भुइयाँ मा इतरात चल, सागर मा मिल जाव।।
‎करिया टूरा नानकुन, पीसत चकना चूर।
‎नाक चढ़य ता छींक दे, महिमा हे भरपूर।।
‎दाँत नहीं पर काट दे, झटकुन देवय फाँक।
‎दू पल्ला बिन सून हे, बूझव थोकुन झाँक।।
‎दुब्बर पातर नानकुन, मुँह मा चोखा धार।
‎लकर धकर ले कूद के, कपड़ा कर तैयार।।
‎रतिहा बुग-बुग ले बरय, रुख राई मा बास।
‎बिन बाती बिन तेल के, जगमग करथे खास।।
‎करिया काया ला धरे, कउवा जस झन मान।
‎बइठे रुख के डार मा, गावय गुरतुर गान।।
‎हीरा अउ मोती नहीं, भिनसरहा के हार।
‎माड़ा हरियर पान मा, फबथे बड़ सिंगार।।
‎बिन आगी उठथे धुआँ, भिनसरहा ले छाय।
‎सुरुज ददा ला देख के, लटपट सरकत जाय।।
‎माटी ले काया बनय, सुग्घर गोल मटोल।
‎सस्ता फ्रिज गरीब के, पानी रखय अमोल।।
‎🌈 उत्तरमाला 🌈
‎❶ बादर (बादल) ❷ नदिया (नदी) ❸ बटुरा मरिच(काली मिर्च) ❹ कैंची ❺ सुई ❻ जुगनू ❼ कोयल ❽शीत (ओस) ❾ कुहरा (कोहरा) ❿ करसा(मटका)
रचनाकार – हेमलाल साहू
‎पक्षी विहार गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा

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