हेम के दोहे (बाल जनऊला 4)
डेरा रहय अगास मा, पाँव बिना चल जाव।
काँवर मा पानी भरे, गाँव-गाँव बरसाव।।
लेवय जनम पहाड़ मा, पालय पोसय गाँव।
भुइयाँ मा इतरात चल, सागर मा मिल जाव।।
करिया टूरा नानकुन, पीसत चकना चूर।
नाक चढ़य ता छींक दे, महिमा हे भरपूर।।
दाँत नहीं पर काट दे, झटकुन देवय फाँक।
दू पल्ला बिन सून हे, बूझव थोकुन झाँक।।
दुब्बर पातर नानकुन, मुँह मा चोखा धार।
लकर धकर ले कूद के, कपड़ा कर तैयार।।
रतिहा बुग-बुग ले बरय, रुख राई मा बास।
बिन बाती बिन तेल के, जगमग करथे खास।।
करिया काया ला धरे, कउवा जस झन मान।
बइठे रुख के डार मा, गावय गुरतुर गान।।
हीरा अउ मोती नहीं, भिनसरहा के हार।
माड़ा हरियर पान मा, फबथे बड़ सिंगार।।
बिन आगी उठथे धुआँ, भिनसरहा ले छाय।
सुरुज ददा ला देख के, लटपट सरकत जाय।।
माटी ले काया बनय, सुग्घर गोल मटोल।
सस्ता फ्रिज गरीब के, पानी रखय अमोल।।
🌈 उत्तरमाला 🌈
❶ बादर (बादल) ❷ नदिया (नदी) ❸ बटुरा मरिच(काली मिर्च) ❹ कैंची ❺ सुई ❻ जुगनू ❼ कोयल ❽शीत (ओस) ❾ कुहरा (कोहरा) ❿ करसा(मटका)
रचनाकार – हेमलाल साहू
पक्षी विहार गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा
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