हेम के दोहे (बाल जनऊला–6)
सादा कपड़ा ओढ़ के, धरथे साधू भेस।
पानी भीतर झाँकके, झटले धर लीलेस।।
गलती ला गप्पल जथे, कबो नहीं चिचियाय।
कागज उप्पर फेर दे, सबो साफ हो जाय।।
घर के आगू ठाढ़ हे, चौड़ा सीना तान।
पहरा देवय रात दिन, का हे नाव सुजान।।
सोना जइसन रंग हे, किसान रखय समेट।
पूजा करय किसान मन, भरथे कोठी पेट।।
रतिहा परदा फार के, लावय नवा बिहान।
तोर बिना जग कुछु नहीं, बूझव नाव सियान।।
पानी पीके जीय थे, बिन पानी अइलाय।
पटकू ला ओढ़े हरा, अँगना भर मुस्काय।।
बड़े-बड़े ले मूछ हे, छोट जीव के काल।
दबके बइठे ताकथे, धीरज चतुरा चाल।।
करिया काया नानकुन, चोककु लम्बा दाँत।
कुतर-कुतर के धान खा, ची-ची करथे बात।।
लकड़ी रस्सी देह हे, एक चलय ना पाँव।
लेटत भर ले नींद दे, बूझव ओकर नाव।।
नइ उड़य ओ अगास मा, फेर पाँख हे चार।
फरफर-फरफर घूम के, देय पसीना मार।।
उत्तरमाला
🐦 कोकड़ा (बगुला) | ✏️ मेटली (रबर) | 🚪 कपाट (दरवाजा) | 🌾 धान | ☀️ सूरज | 🌱 पौधा | 🐱 बिलई (बिल्ली) | 🐭 मुसवा (चूहा) | 🛏️ खटिया(खाट)| 🌬️ पंखा
रचनाकार – हेमलाल साहू
चिरई के गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा
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