Sunday, 26 July 2026

‎मुसवा-बिलई के लड़ई

‎मुसवा-बिलई के लड़ई
‎मुसवा-बिलई ठनगे लड़ई।
‎बिलई ऊपर मुसवा झपई।।
‎मुसवा कहिथे, "मौसी बिलई!
‎जो जीतय, ओ खावय मलई।।"
‎बिलई कहिथे, "आ रे दाऊ!
‎हार जबे ता तोला खाऊ।।"
‎मिलके खेलय गिल्ली-डंडा।
‎मुसवा रचिस नवा हथकंडा।।
‎बिलई डंडा घुमइस भारी।
‎गिल्ली उड़के घुसगे बारी।।
‎गिल्ली खोजत मुसवा भागिस।
‎ओकर पाछू बिलई आगिस।।
‎मौका पा जा खुसरे बिल मा।
‎बिलई देखत रहिगे तिर मा।।
‎गिल्ली-डंडा के जुग टुटगे।
‎मुसवा हर बिलई ले छुटगे।।
‎रचनाकार: हेमलाल साहू
‎ग्राम: गिधवा, जिला: बेमेतरा

‎हेम के हास्य कविता — "बिक्कट भुलहा बबा"‎

‎हेम के हास्य कविता — "बिक्कट भुलहा बबा"
‎हमर बबा हे बिक्कट भुलहा, घर के पहरादार।
‎चश्मा पहिरे चश्मा खोजय, सबला देय पुकार।।
‎मेछा अइठत तेवर देवय, बनथे बड़ सरदार।
‎जेबे भीतर चाबी रहिथे, छानय घर-कोठार।।
‎बड़का मुसवा मार गिराइस, बनगे बड़का शेर।
‎काँधा ऊपर गमछा धरके, गमछा खोजय फेर।।
‎दाई कहिस नून ले आबे, नाती ला ले साथ।
‎नून के जगा चीनी लेलिस, दाई धरिसे माथ।।
‎बबा पटफटी लेके निकरिस, जब्बर झाड़य शान।
‎एक जगा मा छोड़ पटफटी, खोजय हो हलकान।।
‎मोबाइल ला दाई ला दे, खोजत घर भर आय।
‎दाई धर मोबाइल बइठे, घर भर हाँसी छाय।।
‎पनही पहिरे ठसक दिखावय, बनके राजा भोज।
‎पनही पहिरे पनही खोजय, घर भर हाँसी रोज।।
‎जब्बर छाती, ऊँचा काठी, बड़ हिम्मतहा आय।
‎हाथे लाठी धरके पूछय – "लाठी कहाँ मढ़ाय?"।।
‎रोज नवा किस्सा रच देवय, हाँसय घर-परिवार।
‎हमर बबा हे बिक्कट भुलहा, रखथे मया-अपार।।
‎रचनाकार - हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 

Friday, 24 July 2026

‎बरखा रानी के नखरा

‎बरखा रानी के नखरा
‎बरखा रानी नखरा मारत, 
‎कूदत-नाचत आत।
‎जस छाता धर तस भींजोवत,
‎देख-देख इतरात॥
‎चप्पल पहिरे निकरिन बाहिर,
‎चिखला धरिलिस पाँव।
‎सरले फिसलिन हाँसिन जम्मो,
‎देखत रहिगे गाँव।।
‎सड़क छोटकुन नदिया बनगे,
‎पानी बहय अपार।
‎मोटर-गाड़ी पहिया थमगे,
‎धकियावय सब यार।।
‎नरवा नदिया मस्ती मारय,
‎बाँधा भरगे आज।
‎बरखा कहिस – "मोर दिन आइस",
‎करहूँ कसके राज।।
‎कपड़ा धोके डारिन बाहिर,
‎बरखा देइस मात।
‎घमुआ आके झाँकिस थोकिन,
‎फेर गिरिस बरसात।।
‎हेम कहिस सुन बरखा रानी,
‎थोरिक धरव धियान।
‎बरखा हँसके कहिस – "मोर बिन,
‎कइसे होही धान?"।।
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)
‎धरती कोरा मा बसे, अँचरा ओढ़य सोय।
‎जतका खोदे ओतके, बाढ़त बड़का होय।।
‎आँखी मा दिखथे कहाँ, डार-पान हालाय।
‎हाथे नइ आवय कभू, सबो डहर बगराय।।
‎दुब्बर पातर नानकुन, हवा पेट फूलोय।
‎रंग बिरंगा देख के, लइका मन खुश होय।।
‎बरखा थमय अगास मा, सात रंग मुसकाय।
‎धरती अगास बीच मा, पुलिया कौन बनाय।।
‎आँखी नइहे फेर ओ, नाक-कान टिक जाय।
‎धुँधला नजर सुधार के, दुनिया साफ देखाय।।
‎लोहा-प्लास्टिक के बने, मुड़ ऊपर बइठाय।
‎बाइक वाले संग रहि, ओकर जान बचाय।।
‎हवा संग उड़ते फिरे, आँखी मा गड़ जाय।
‎पानी पाके हाथ मा, चिखला बन लफटाय।।
‎हरियर रहिथे रूप हा, डारा भर लटकाय। 
‎पाके भुरुवा होय के, मुँह मा पानी लाय।।
‎माटी पानी संग मा, कसके पकड़ बनाय।
‎ईटा-पथरा जोड़ के, घर-दुआर ठाढ़ाय।।
‎बिना तेल के रातभर, उजियारा बगराय।
‎खुद जरके ओ छोट हो, ओकर नाव बताय।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा 

हेम के दोहे (बाल जनऊला–9)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–9)


‎मुँह दाँत जीभिया नहीं, काया पोंडा होय।

‎फूँक देत ता राग दे, बिना फूँक चुप सोय।।


‎ऊपर हे झबरा जटा, काया कठुआ पोठ।

‎कारी आँखी तीन ठन, भीतर गूदा रोठ।।


‎पानी दाना खाय नइ, पखना के जे पूत।

‎टकरावत चिनगी झरे, सुलगा देवय सूँत।।


‎उज्जर काया खोखला, फूँक परत हुंकार।

‎मंदिर भर गूँजत उठय, मंगल करत पुकार।।


‎दू अँगरी हे एक मुँह, चलथे एक्के साथ।

‎दहकत धरके अंगरा, मनखे बचाय हाथ।।


‎कुआँ नहीं पानी झरे, घाम काम ले गार।

पीये कोनो जन नहीं, हवा पाय ले हार।।


‎चलय नहीं दौड़य नहीं, बिना पाँव पहुँचाय।

‎गाँव-शहर ला जोड़ के, जग ला छोट बनाय।।


‎डिक्टो मनखे कस लगे, फेर चले ना साँस।

‎पहिरे फटहा कोट ला, काया लउठी बाँस।।


‎दुरिहा जावय पाँव बिन, संदेसा पहुँचाय। 

‎ओकर मुँह नइहे तभो, जम्मो बात बताय।।


‎करिया धूसर रूप धर, भागत चढ़य अगास।

‎आँखी मा पानी भरे, खांसत निकले साँस।।


‎उत्तरमाला


‎🎶 बंसी (बासुरी)• 🥥 नरियर (नारियल )• 🪨 चकमक  • 🐚 शंख • 🔥 चिमटा • 💦 पसीना • 🛣️ रद्दा (सड़क )• 🌾 पुतला • ✉️ पाती (चिट्ठी )• 🌫️ धुआँ


‎रचनाकार -हेमलाल साहू

‎चिरई के गाँव - गिधवा, जिला-बेमेतरा



🌼 हेम के दोहे (बाल जनऊला–8) 🌼

🌼 हेम के दोहे (बाल जनऊला–8) 🌼

दुब्बर पतली कमरिया, तीखा ओकर धार।
लकर-धकर ले काट दे, ठाढ़े धान जुआर।।

गोड़ हाथ अउ मुँह नहीं, बाँधे सौ-सौ गाँठ।
बइला बोझा खाट संग, गाढ़ा रहिथे साँठ।।

तीन जीव के संग ले, चलथे एक्के ओर।
खरर-खरर ले जोत के, धरती सीना फोर।।

पतली-पसली बाँस के, गूँथय गोल लपेट।
ऊपर ढक्कन दाब के, भीतर रखय समेट।।

दूठन डंडा गोड़ जस, पइदान ले बनाय।
एक्को पाँव उठाय ना, सबला सरग चढ़ाय।।

सौ-सौ दुवार एक घर, सबो रहँय परिवार।
फूलन रसा बटोर के, भरँय अपन भंडार।।

बिन करघा बिन सूत के, गजबे कारीगार।
तिनका-पाना जोड़ के, बुन देवय घरबार।।

डारा ऊपर बइठ के, बदलत रंग हजार।
फेंके झटले जीभिया, फटले धरे शिकार।।

चोंचकु मुँह तन नानकुन, हिम्मत रखय अपार।
ठक-ठक रुख मा छेद कर, पावय अपन अहार।।

बादर ले पानी गिरे, फुटथे छतरी तान।
ना बीजा रोपा लगे, करले तँय पहिचान।।

🌈 उत्तरमाला 🌈

❶ 🔪 हँसिया • ❷ 🪢 रस्सी • ❸ 🚜🐂 नागर (हल) • ❹ 🧺 झाँपी • ❺ 🪜 निसैनी (सीढ़ी) • ❻ 🐝🍯 मधुमक्खी के छत्ता • ❼ 🐦🪺 बया चिरई के घोंसला • ❽ 🦎 गिरगिट • ❾ 🐦🌳 कठखोलवा (कठफोड़वा) • ❿ 🍄 पिहरी (कुकुरमुत्ता)

✍️ रचनाकार – हेमलाल साहू
📍 चिरई के गाँव – गिधवा, जिला – बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

‎🐸 मेचका (बाल कविता)‎

‎🐸 मेचका (बाल कविता) ‎ ‎टप-टप बरसे सुग्घर पानी, ‎नान्हे मन ला भावय। ‎गात मया के गीत मेचका, ‎टर्र-टर्र ले टर्रावय।। ‎ ‎उत्ताधुर्रा जीभ लमावय...

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