बरखा रानी के नखरा
बरखा रानी नखरा मारत,
कूदत-नाचत आत।
जस छाता धर तस भींजोवत,
देख-देख इतरात॥
चप्पल पहिरे निकरिन बाहिर,
चिखला धरिलिस पाँव।
सरले फिसलिन हाँसिन जम्मो,
देखत रहिगे गाँव।।
सड़क छोटकुन नदिया बनगे,
पानी बहय अपार।
मोटर-गाड़ी पहिया थमगे,
धकियावय सब यार।।
नरवा नदिया मस्ती मारय,
बाँधा भरगे आज।
बरखा कहिस – "मोर दिन आइस",
करहूँ कसके राज।।
कपड़ा धोके डारिन बाहिर,
बरखा देइस मात।
घमुआ आके झाँकिस थोकिन,
फेर गिरिस बरसात।।
हेम कहिस सुन बरखा रानी,
थोरिक धरव धियान।
बरखा हँसके कहिस – "मोर बिन,
कइसे होही धान?"।।
रचनाकार-हेमलाल साहू
गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा
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