हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)
धरती कोरा मा बसे, अँचरा ओढ़य सोय।
जतका खोदे ओतके, बाढ़त बड़का होय।।
आँखी मा दिखथे कहाँ, डार-पान हालाय।
हाथे नइ आवय कभू, सबो डहर बगराय।।
दुब्बर पातर नानकुन, हवा पेट फूलोय।
रंग बिरंगा देख के, लइका मन खुश होय।।
बरखा थमय अगास मा, सात रंग मुसकाय।
धरती अगास बीच मा, पुलिया कौन बनाय।।
आँखी नइहे फेर ओ, नाक-कान टिक जाय।
धुँधला नजर सुधार के, दुनिया साफ देखाय।।
लोहा-प्लास्टिक के बने, मुड़ ऊपर बइठाय।
बाइक वाले संग रहि, ओकर जान बचाय।।
हवा संग उड़ते फिरे, आँखी मा गड़ जाय।
पानी पाके हाथ मा, चिखला बन लफटाय।।
हरियर रहिथे रूप हा, डारा भर लटकाय।
पाके भुरुवा होय के, मुँह मा पानी लाय।।
माटी पानी संग मा, कसके पकड़ बनाय।
ईटा-पथरा जोड़ के, घर-दुआर ठाढ़ाय।।
बिना तेल के रातभर, उजियारा बगराय।
खुद जरके ओ छोट हो, ओकर नाव बताय।।
रचनाकार -हेमलाल साहू
गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा
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