Friday, 24 July 2026

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)
‎धरती कोरा मा बसे, अँचरा ओढ़य सोय।
‎जतका खोदे ओतके, बाढ़त बड़का होय।।
‎आँखी मा दिखथे कहाँ, डार-पान हालाय।
‎हाथे नइ आवय कभू, सबो डहर बगराय।।
‎दुब्बर पातर नानकुन, हवा पेट फूलोय।
‎रंग बिरंगा देख के, लइका मन खुश होय।।
‎बरखा थमय अगास मा, सात रंग मुसकाय।
‎धरती अगास बीच मा, पुलिया कौन बनाय।।
‎आँखी नइहे फेर ओ, नाक-कान टिक जाय।
‎धुँधला नजर सुधार के, दुनिया साफ देखाय।।
‎लोहा-प्लास्टिक के बने, मुड़ ऊपर बइठाय।
‎बाइक वाले संग रहि, ओकर जान बचाय।।
‎हवा संग उड़ते फिरे, आँखी मा गड़ जाय।
‎पानी पाके हाथ मा, चिखला बन लफटाय।।
‎हरियर रहिथे रूप हा, डारा भर लटकाय। 
‎पाके भुरुवा होय के, मुँह मा पानी लाय।।
‎माटी पानी संग मा, कसके पकड़ बनाय।
‎ईटा-पथरा जोड़ के, घर-दुआर ठाढ़ाय।।
‎बिना तेल के रातभर, उजियारा बगराय।
‎खुद जरके ओ छोट हो, ओकर नाव बताय।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा 

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