Monday, 11 July 2022

स्कूल पढ़े बर जाहूँ (हेम के सार छंद)

‎स्कूल पढ़े बर जाहूँ (हेम के सार छंद)

‎

‎स्कूल पढ़े बर जाहूँ मोला,

‎पकड़ा दे तँय बस्ता।

‎कहिथे नोनी हर बाबू ला,

‎बता स्कूल के रस्ता।।

‎

‎भर्ती मोला आज करा दे,

‎स्कूल रोज मँय जाहूँ।

‎सुनले विनती मोरो बाबू,

‎सुघ्घर विद्या पाहूँ।।

‎

‎पढ़ई-लिखई मा जोर लगा,

‎हरदम अव्वल रइहूँ।।

‎खेल-कूद ले मन रख चंगा,

‎सबले आगू बढ़हूँ।।

‎

‎पट्टी मा खड़िया ले खींचवँ, 

‎चंदा सूरज तारा।  

‎पोथी मा मोर मुकुट बना के, 

‎रंग-रंग के धारा।।

‎

‎आखर आखर गुन-गुन के मँय,  

‎पन्ना-पन्ना लिखहूँ।  

‎विद्या के जोत जगा मन मा,

‎जिनगी ला मँय गढ़हूँ।।

‎

‎खुरमी चीला बरा ठेठरी, 

‎मुर्रा ले के जाहूँ।

‎खाना छुट्टी बेर बाँट के,

‎संगी साथी सँग खाहूँ।।

‎

‎अपन स्कूल मा होशियार बन,

‎जग मा नाम कमाहूँ।

‎मास्टर जी कस ज्ञान सीख के,

‎सबला रोज पढ़ाहूँ।।

‎

‎पढ़ई लिखई भविष्य कुंजी।

‎हमर ज्ञान जिनगी के पूँजी।।

‎

‎रचनाकार- हेमलाल साहू

‎गाँव -गिधवा, जिला बेमेतरा 


‎

फुग्गा वाले (हेम के चौपाई छंद)

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‎
‎फुग्गा वाले (हेम के चौपाई छंद)
‎
‎फुग्गा वाले भइया बुग्गा।
ले आइस रंग-रंग के फुग्गा।।
‎
‎लाल हरा अउ पियरी नीला।
‎सुग्घर लागय सब रंगीला।।
‎
‎गाँव-गाँव गली-गली घूमय।
‎देख-देख लइका मन झूमय।।
‎
‎फुग्गा देखत लइका हाँसत।
‎घर ले दौड़त आइस हाफत।।
‎
‎लइका खेलय-कूदय, नाचय।
‎फुग्गा पाके मन हरसावय।।
‎
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव गिधवा, जिला-बेमेतरा (छत्तीसगढ़)

Sunday, 19 June 2022

गिधवा के गाँव (सरसी छंद)

‎गिधवा के गाँव (सरसी छंद)
‎
‎हवय शहर ले कतका बढ़िया,
‎गिधवा के रे गाँव।
‎माटी-खपरा घर सुग्घर,
‎मया भरे हर ठाँव।।
‎
‎सुरुज देव के होत बिहनिया,
‎जगमग होवय गाँव।
‎हरियर-हरियर डारा-पाना,
‎रुखराई के छाँव।।
‎
‎चिरई-चुरगुन घूमत हावय,
‎डेना अपन पसार।
‎अब्बड़ निक लगथे सबला रे,
‎तरिया-नदिया पार।।
‎
‎जिहाँ किसानी मा जिनगानी,
‎सुग्घर खेती-खार।
‎माहामाया दाई देवत,
‎अन्न-धन्न भंडार।।
‎
‎छोटे-छोटे लगथे बढ़िया,
‎जिहाँ हॉट-बाजार।
‎तौल-मोल करके ले ले तँय,
‎सबला छाँट-निमार।।
‎
‎दाई, काकी, दादी, बहिनी,
‎सबके मया-दुलार।
‎बाबू, कका, बबा अउ भैया,
‎हिम्मत देय अपार।।
‎
‎समरसता के दीया बारय,
‎दूर करँय अँधियार।
‎भेद-भाव ला दूर भगावय,
‎बाँधय सुमता पार।।
‎
‎बाबू कहिथे बबलू रोशन,
‎महिमा गावत जावँ।
‎सबले सुग्घर हावय बेटा,
‎गिधवा के रे गाँव।।
‎
‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला- बेमेतरा


Saturday, 18 June 2022

मोर ददा (बरवै छंद)

‎
‎मोर ददा हे सुग्घर, सबले पोठ।
‎सुनवव भैया-बहिनी, मोरो गोठ।।
‎
‎अपन मानथौं जेला, जस भगवान।
‎ओखर सीख मानथौं, बन इंसान।।
‎
‎सच्चा हावय जेकर, मया दुलार।
‎विपदा मा खड़े रहय, बन रखवार।।
‎
‎डाँटय फटकारय अउ, देवय साथ।
‎मोर जीत मा हावय, जेकर हाथ।।
‎
‎हमला मेला ले जावय, हर इतवार।
‎हाँसत-खेलत पाथन, मया अपार।।
‎
‎घर के सबले बड़का, हवे सियान।
‎खड़े रहय बइरी बर, सीना तान।।
‎
‎ददा मोर बर हावँय, बड़का ज्ञान।
‎जेकर कारन मोरो, हे पहिचान।।
‎
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला बेमेतरा
‎
मोर ददा (बरवै छंद) बाल कविता

मोर ददा हे सुग्घर, सबले पोठ।
सुनले चिंकी बनही, मोरो गोठ।।

अपन मानथौं जेला, जी भगवान।
पूजा करँव नेक मँय, बन इंसान।।

सच्चा हावय जेकर, मया दुलार।
छाती जब्बर हिम्मत, हवे अपार।।

डाँटय फटकारय अउ, देवय साथ।
मोर सफलता मा हे, जेकर हाथ।।

हम ला लेके जावय, पिकनिक टूर।
छोड़ लड़ाई झगड़ा, रहिथे दूर।।

घर के सबले बड़का, हवे सियान।
खड़े हवय बइरी बर, सीना तान।।

ददा मोर बर हावँय, विद्या ज्ञान।
जेकर कारण मोरो, हे पहचान।।

-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-१
ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा

Tuesday, 14 June 2022

रक्तदान करलव (हेम के शंकर छंद)


रक्त करवल दान (हेम के शंकर छंद)

बात बतावँत हावय चुन्नी,
रक्त करलव दान।
दूर भगालँव मन के डर ला,
होय ना नुकसान।।

तन-मन हा तोर स्वस्थ रइही,
मोर कहना मान।
दे दँव जी मरीज ला सुघ्गर,
आप जीवनदान।।

कैंसर जस कतको बीमारी,
होय तन ले दूर।
एक बार करके देखव जी,
रक्तदान जरूर।।

भाई-चारा सुम्मत बगरय,
पूण्य हावय काज।
सबला समझावँय चुन्नी हा,
ठान लौ मन आज।।

काम सबो के आवँन संगी,
नेक बन इंसान।
रक्त दान कर जग मा बढ़िया,
काम करँव महान।।

-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-1
ग्राम-गिधवा, जिला-बेमेतरा

Friday, 10 June 2022

*आजा बरखा रानी* (चौपाई छंद)

‎आजा बरखा रानी* (चौपाई छंद)
‎
‎आजा-आजा बरखा रानी।
‎इहाँ गिरादे झटकुन पानी।।
‎
‎सुरुज देव आगी फेंकत हे।
‎हरर हरर सब ला सेंकत हे।।
‎
‎घाम जनावत हावय भारी।
‎लू मा उपजत हे बीमारी।।
‎
‎तरिया नदिया सबो अँटागे।
‎कुँआ बावली सबो सुखागे।।
‎
‎सुख्खा के आगी तड़पावत।
‎हैंडपंप घलो लड़खड़ावत।।
‎
‎टैंकर आगू नाच लगावत।  
‎पानी बर रोजे कल्लावत।।  
‎
‎बोरवेल के मोटर हाँफय।
‎पानी बिन मशीन हा काँपय।।
‎
‎नल-जल के पाइप रोवत हे।
‎पेड़ काट मनखे सोवत हे।।
‎
‎छोड़व बरखा आना-कानी।
‎तरसत हावँय सबो परानी।।
‎
‎दिखही कब ये बदरी कारी।
‎आही कब तोर इहाँ बारी।।
‎
‎आजा कँसके मार झकोरा।
‎हावँय सब ला तोर अगोरा।।
‎
‎फेर मया बरखा बरसादे।
‎कारी-कारी बदरी ला दे।।
‎
‎टर्र मेचका राग सुनाही। 
‎खेती खार फेर हरियाही।।
‎
‎तरिया नदिया उफान मारे।  
‎दाई आँखी अँसुवन ढारे।।
‎
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 
‎
‎

*परसा पेड़ (बरवै छंद)*

‎🌳 पसरा पेड़ (पलाश)
‎(बरवै छंद) बाल कविता 
‎
‎हावय बड़ उपयोगी, परसा पेड़।
‎पाबे खेत-खार के, सुघ्घर मेड़।।
‎
‎आथे डारा-पाना, जड़-फर काम।
‎रोग भगाये तन ले, दै आराम।। 
‎
‎सबो जीव के बनथे, सुघ्घर ठाँव।
‎बचा घाम ले सब ला, देवय छाँव।।
‎
‎बड़का-बड़का लावँय, पाना टोर।
‎तुनथें पतरी-दोना, कड़गी जोर।।
‎
‎फर टोर कमाले तँय, पैसा चार।
‎औषधि बर बीकय, हाट-बजार।।
‎
‎रुख के जर ले निकलै, कुंवर बाख।
‎बड़ गुणकारी हावय, एखर लाख।।
‎
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला बेमेतरा
‎

‎🐸 मेचका (बाल कविता)‎

‎🐸 मेचका (बाल कविता) ‎ ‎टप-टप बरसे सुग्घर पानी, ‎नान्हे मन ला भावय। ‎गात मया के गीत मेचका, ‎टर्र-टर्र ले टर्रावय।। ‎ ‎उत्ताधुर्रा जीभ लमावय...

सबले ज्यादा पढ़े गिस