मोर ददा (बरवै छंद) बाल कविता
मोर ददा हे सुग्घर, सबले पोठ।
सुनले चिंकी बनही, मोरो गोठ।।
अपन मानथौं जेला, जी भगवान।
पूजा करँव नेक मँय, बन इंसान।।
सच्चा हावय जेकर, मया दुलार।
छाती जब्बर हिम्मत, हवे अपार।।
डाँटय फटकारय अउ, देवय साथ।
मोर सफलता मा हे, जेकर हाथ।।
हम ला लेके जावय, पिकनिक टूर।
छोड़ लड़ाई झगड़ा, रहिथे दूर।।
घर के सबले बड़का, हवे सियान।
खड़े हवय बइरी बर, सीना तान।।
ददा मोर बर हावँय, विद्या ज्ञान।
जेकर कारण मोरो, हे पहचान।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक सत्र-१
ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा
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