चौमासा किंजरत फिरे, पुसवा दुबके जाय।
आहट पावय ता खड़े, मुड़ी उठा फुसकाय।।
माटी के तन पेट मा, आगी ला सुलगाय।
लकड़ी छेना डार ता, लपटा उप्पर जाय।।
दू काया मुँह एकठन, दाना खावय नीस।
घर के कुरिया बैठ के, सबला घड़घड़ पीस।।
शीशा के घर मा रहे, रतिहा कर उजियार।
जिनगी बाती-तेल हे, ओकर बिन अँधियार।।
एक्ठो मुँह बिन दाँत के, दाना खाय हजार।
अपन पेट भर फेंकथे, सबला छाँट निमार।।
पथरा ले पथरा दबा, मिरचा ला रोवाय।
लादा पोटा एक कर, सुघ्घर स्वाद बढ़ाय।।
काया गहरा गोल हे, धरय धान भरमार।
थुथना-थुथना मार के, भूसा फेक उतार।।
मगरा कस काया हवे, बइठे परछी पार।
दबक-दबक के पाँव ले, भूसा देय उतार।।
बिन इंजन अउ तेल के, दू संगी ले जूर।
लकड़ी के काया बने, चलथे कोसो दूर।।
लोहा के दाँता गड़ा, धरती छाती चीर।
रेंगय ओरी ओर ले, खींचे खड़ा लकीर।।
उत्तरमाला : 🐍 नाग (साँप) | 🔥 चूल्हा | ⚪ जाँता (हाथ चक्की) | 🏮 लालटेन | 🎋 सूपा (सूप) | 🪨 सिल-लोढ़ा (सिलबट्टा) | 🌾 ओखली (उखर) | 🌾 ढेंकी | 🐂 बैलगाड़ी | 🌾 नागर (हल)
रचनाकार – हेमलाल साहू
चिरई के गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा
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