Thursday, 25 June 2026

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–7)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–7)
‎चौमासा किंजरत फिरे, पुसवा दुबके जाय।
‎आहट पावय ता खड़े, मुड़ी उठा फुसकाय।।
‎माटी के तन पेट मा, आगी ला सुलगाय।
‎लकड़ी छेना डार ता, लपटा उप्पर जाय।।
‎दू काया मुँह एकठन, दाना खावय नीस।
‎घर के कुरिया बैठ के, सबला घड़घड़ पीस।।
‎शीशा के घर मा रहे, रतिहा कर उजियार।
‎जिनगी बाती-तेल हे, ओकर बिन अँधियार।।
‎एक्ठो मुँह बिन दाँत के, दाना खाय हजार।
‎अपन पेट भर फेंकथे, सबला छाँट निमार।।
‎पथरा ले पथरा दबा, मिरचा ला रोवाय।
‎लादा पोटा एक कर, सुघ्घर स्वाद बढ़ाय।।
‎काया गहरा गोल हे, धरय धान भरमार।
‎थुथना-थुथना मार के, भूसा फेक उतार।।
‎मगरा कस काया हवे, बइठे परछी पार।
‎दबक-दबक के पाँव ले, भूसा देय उतार।।
‎बिन इंजन अउ तेल के, दू संगी ले जूर।
‎लकड़ी के काया बने, चलथे कोसो दूर।।
‎लोहा के दाँता गड़ा, धरती छाती चीर।
‎रेंगय ओरी ओर ले, खींचे खड़ा लकीर।।
‎उत्तरमाला : 🐍 नाग (साँप) | 🔥 चूल्हा | ⚪ जाँता (हाथ चक्की) | 🏮 लालटेन | 🎋 सूपा (सूप) | 🪨 सिल-लोढ़ा (सिलबट्टा) | 🌾 ओखली (उखर) | 🌾 ढेंकी | 🐂 बैलगाड़ी | 🌾 नागर (हल)
‎रचनाकार – हेमलाल साहू
‎चिरई के गाँव – गिधवा, जिला बेमेतरा

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‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–7) ‎ ‎चौमासा किंजरत फिरे, पुसवा दुबके जाय। ‎आहट पावय ता खड़े, मुड़ी उठा फुसकाय।। ‎ ‎माटी के तन पेट मा, आगी ला सुलगाय...

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