अमर सिपाही
बाल कविता
कहिथे नोनी सुन दाई ला, बनहूँ मँय अमर सिपाही।
अपन देस के रखवारी बर, तन-मन अरपन हो जाही।।
मोरो रग-रग मा भारत हे, बनहूँ मँय हा मर्दानी।
बइरी मन ले लोहा लेहूँ, बन मँय झाँसी के रानी।।
भारत मोरे भाग्य विधाता, रोजे मँय गावँव गाथा।
हे भारत भुइँया महतारी, तोर चरन टेकव माथा।।
बइरी मन के काल बनव मँय, घुसे नहीं सीमा द्वारी।
खड़े तान के सीना रइहूँ, सौ-सौ झन बर मँय भारी।।
काली दुर्गा रनचंडी बन, बइरी ला मार भगाहूँ।
तीन रंग ले सजे तिरंगा, सदा-सदा मँय लहराहूँ।।
अटल खड़े रइहूँ पहाड़ जस, अपन देश के मँय सीमा।
देख-देख बइरी मन भागय, ताकत रखहूँ जस भीमा।।
बइरी कतको मार भगाहूँ, बनके मँय वीर दबंगा।
मर जाहूँ ता पहिरा देबे, मोला तँय कफन तिरंगा।।
जय भारत जय जय भारतीय, बोले दुनिया जयकारा।
अपन वीर बलिदानी मन के, गूँजय सबो डहर नारा।।
रचनाकार - हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला-बेमेतरा
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