सुघ्घर आइस मौसम जाड़ा।
चारो डहर ओस के माड़ा।।
भोर बिहनिया मोती चमकत।
सुरुज देव निकरे ता दमकत।।
फुलवा जाड़ा मा मुस्कावत।
रंग-बिरंगा सब ला भावत।।
चिरई-चिरगुन बइठे ठुठरत।
सबो जीव जाड़ा मा कुड़कत।।
हाथ गोड़ हर काँपत कसके।
दाँत किटकिटावत हे जमके।।
सुरुज देव गरमी बगरावत।
देखत-देखत जाड़ा भागत।।
सुन ले बहनी, सुन ले बेटी।
जाड़ कपावत खोलव पेटी।।
कथरी, चद्दर, शाल, रजाई।
स्वेटर, टोपी, ओढ़व भाई।।
तापव भूर्री ला मन भर ले।
जाड़ा भगाव सब्बो तन ले।।
रचनाकार -हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला- बेमेतरा
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