Saturday, 1 August 2026

‎हेम के सरसी छंद *मया के डोर*

‎हेम के सरसी छंद
‎
‎मया के डोर
‎
‎बाल कविता
‎
‎नान्हे-नान्हे लइका हावन, बनबो पहरेदार।
‎बापू के रद्दा मा चलबो, लाबो नव उजियार।।
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‎गौतम बुद्ध ले दया सीखव, पावव सत्य गियान।
‎भगत सिंह जस बनके संगी, रखबो भारत मान।।
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‎मिलके समरसता बगराबो, जोड़ मया के डोर।
‎मया-दया ला हमन बाँटबो, देस के सबो छोर।।
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‎हरियर लुगरा ला पहिराबो, हँसही धरती मोर।
‎जंगल-झाड़ी मन मुसकाही, फुलही जम्मो ओर।।
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‎सबो डहर खुशहाली रइही, चिरई मन के सोर।
‎गाँव-गाँव ला सरग बनाबो, बगराबो अंजोर।।
‎
‎रचनाकार : हेमलाल साहू
‎गाँव : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
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‎बरखा रानी के रंग (हेम के सार छंद)

‎बाल कविता
‎
‎बरखा रानी के रंग (हेम के सार छंद)
‎
‎करिया-करिया बादर देखत
‎हाँसत हे जिनगानी।
‎सबके मन मा आस जगत हे,
‎आवत बरखा रानी।।
‎
‎पानी देख मेचका टर्रय,
‎सुख के देय निशानी।
‎रुनझुन-रुनझुन पानी आथे,
‎बढ़िया होय किसानी।।
‎
‎गावत सुघ्घर गीत ददरिया,
‎बैठ किसान दुआरी।
‎सावन-भादो महिना आगय,
‎छाय घपट अँधियारी।।
‎
‎चंदा सूरज लुका छुपी ला,
‎खेलँय पारी-पारी।
‎छावय जग मा घुमड़-घुमड़ के,
‎बदरी कारी-कारी।।
‎
‎उछलत कूदत नाचत-नाचत,
‎करँय तमासा मछरी।
‎झूमर-झूमर डोरी नाचत,
‎पिटय केकड़ा डफरी।।
‎
‎झींगुर सोर मचावत हावय,
‎घोंघी खेलँय घाँदी।
‎चारो कोती स्वागत करथे,
‎झूम-झूम के काँदी।।
‎
‎टपटप-टपटप पानी गिरथे,
‎चुहथे खपरा छानी।
‎तरिया-नदिया होय भरावर,
‎सुघ्घर हे जिनगानी।।
‎
‎पहिरे धरती हरियर लुगरा,
‎लाय नवा खुशहाली।
‎चिरई-चुरगुन चहकत नाचय,
‎देखत बड़ हरियाली।।
‎
‎लहलहात हे खेत-खार मन,
‎किरपा बरखा रानी।
‎हेम कहँय संवारव धरती,
‎ऐही धन के दानी।।
‎
‎✍️ रचनाकार : हेमलाल साहू
‎गाँव : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
‎
‎शब्दार्थ :
‎डोरी= "साँप, घाँदी=घूमना, काँदी= घास,मेचका = मेंढक
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Sunday, 26 July 2026

‎मुसवा-बिलई के लड़ई

‎मुसवा-बिलई के लड़ई
‎
‎मुसवा-बिलई ठनगे लड़ई।
‎बिलई ऊपर मुसवा झपई।।
‎
‎मुसवा कहिथे, "मौसी बिलई!
‎जो जीतय, ओ खावय मलई।।"
‎
‎बिलई कहिथे, "आ रे दाऊ!
‎हार जबे ता तोला खाऊ।।"
‎
‎मिलके खेलय गिल्ली-डंडा।
‎मुसवा रचिस नवा हथकंडा।।
‎
‎बिलई डंडा घुमइस भारी।
‎गिल्ली उड़के घुसगे बारी।।
‎
‎गिल्ली खोजत मुसवा भागिस।
‎ओकर पाछू बिलई आगिस।।
‎
‎मौका पा जा खुसरे बिल मा।
‎बिलई देखत रहिगे तिर मा।।
‎
‎गिल्ली-डंडा के जुग टुटगे।
‎मुसवा हर बिलई ले छुटगे।।
‎
‎रचनाकार: हेमलाल साहू
‎ग्राम: गिधवा, जिला: बेमेतरा
‎

‎हेम के हास्य कविता — "बिक्कट भुलहा बबा"‎

‎हेम के हास्य कविता — "बिक्कट भुलहा बबा"
‎
‎हमर बबा हे बिक्कट भुलहा, घर के पहरादार।
‎चश्मा पहिरे चश्मा खोजय, सबला देय पुकार।।
‎
‎मेछा अइठत तेवर देवय, बनथे बड़ सरदार।
‎जेबे भीतर चाबी रहिथे, छानय घर-कोठार।।
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‎बड़का मुसवा मार गिराइस, बनगे बड़का शेर।
‎काँधा ऊपर गमछा धरके, गमछा खोजय फेर।।
‎
‎दाई कहिस नून ले आबे, नाती ला ले साथ।
‎नून के जगा चीनी लेलिस, दाई धरिसे माथ।।
‎
‎बबा पटफटी लेके निकरिस, जब्बर झाड़य शान।
‎एक जगा मा छोड़ पटफटी, खोजय हो हलकान।।
‎
‎मोबाइल ला दाई ला दे, खोजत घर भर आय।
‎दाई धर मोबाइल बइठे, घर भर हाँसी छाय।।
‎
‎पनही पहिरे ठसक दिखावय, बनके राजा भोज।
‎पनही पहिरे पनही खोजय, घर भर हाँसी रोज।।
‎
‎जब्बर छाती, ऊँचा काठी, बड़ हिम्मतहा आय।
‎हाथे लाठी धरके पूछय – "लाठी कहाँ मढ़ाय?"।।
‎
‎रोज नवा किस्सा रच देवय, हाँसय घर-परिवार।
‎हमर बबा हे बिक्कट भुलहा, रखथे मया-अपार।।
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‎
‎रचनाकार - हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 
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Friday, 24 July 2026

‎बरखा रानी के नखरा

‎बरखा रानी के नखरा
‎
‎बरखा रानी नखरा मारत, 
‎कूदत-नाचत आत।
‎जस छाता धर तस भींजोवत,
‎देख-देख इतरात॥
‎
‎चप्पल पहिरे निकरिन बाहिर,
‎चिखला धरिलिस पाँव।
‎सरले फिसलिन हाँसिन जम्मो,
‎देखत रहिगे गाँव।।
‎
‎सड़क छोटकुन नदिया बनगे,
‎पानी बहय अपार।
‎मोटर-गाड़ी पहिया थमगे,
‎धकियावय सब यार।।
‎
‎नरवा नदिया मस्ती मारय,
‎बाँधा भरगे आज।
‎बरखा कहिस – "मोर दिन आइस",
‎करहूँ कसके राज।।
‎
‎कपड़ा धोके डारिन बाहिर,
‎बरखा देइस मात।
‎घमुआ आके झाँकिस थोकिन,
‎फेर गिरिस बरसात।।
‎
‎हेम कहिस सुन बरखा रानी,
‎थोरिक धरव धियान।
‎बरखा हँसके कहिस – "मोर बिन,
‎कइसे होही धान?"।।
‎
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा
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‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–10)
‎
‎धरती कोरा मा बसे, अँचरा ओढ़य सोय।
‎जतका खोदे ओतके, बाढ़त बड़का होय।।
‎
‎आँखी मा दिखथे कहाँ, डार-पान हालाय।
‎हाथे नइ आवय कभू, सबो डहर बगराय।।
‎
‎दुब्बर पातर नानकुन, हवा पेट फूलोय।
‎रंग बिरंगा देख के, लइका मन खुश होय।।
‎
‎बरखा थमय अगास मा, सात रंग मुसकाय।
‎धरती अगास बीच मा, पुलिया कौन बनाय।।
‎
‎आँखी नइहे फेर ओ, नाक-कान टिक जाय।
‎धुँधला नजर सुधार के, दुनिया साफ देखाय।।
‎
‎लोहा-प्लास्टिक के बने, मुड़ ऊपर बइठाय।
‎बाइक वाले संग रहि, ओकर जान बचाय।।
‎
‎हवा संग उड़ते फिरे, आँखी मा गड़ जाय।
‎पानी पाके हाथ मा, चिखला बन लफटाय।।
‎
‎हरियर रहिथे रूप हा, डारा भर लटकाय। 
‎पाके भुरुवा होय के, मुँह मा पानी लाय।।
‎
‎माटी पानी संग मा, कसके पकड़ बनाय।
‎ईटा-पथरा जोड़ के, घर-दुआर ठाढ़ाय।।
‎
‎बिना तेल के रातभर, उजियारा बगराय।
‎खुद जरके ओ छोट हो, ओकर नाव बताय।।
‎
‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा 
‎

हेम के दोहे (बाल जनऊला–9)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला–9)

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‎मुँह दाँत जीभिया नहीं, काया पोंडा होय।

‎फूँक देत ता राग दे, बिना फूँक चुप सोय।।

‎

‎ऊपर हे झबरा जटा, काया कठुआ पोठ।

‎कारी आँखी तीन ठन, भीतर गूदा रोठ।।

‎

‎पानी दाना खाय नइ, पखना के जे पूत।

‎टकरावत चिनगी झरे, सुलगा देवय सूँत।।

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‎उज्जर काया खोखला, फूँक परत हुंकार।

‎मंदिर भर गूँजत उठय, मंगल करत पुकार।।

‎

‎दू अँगरी हे एक मुँह, चलथे एक्के साथ।

‎दहकत धरके अंगरा, मनखे बचाय हाथ।।

‎

‎कुआँ नहीं पानी झरे, घाम काम ले गार।

‎पीये कोनो जन नहीं, हवा पाय ले हार।।

‎

‎चलय नहीं दौड़य नहीं, बिना पाँव पहुँचाय।

‎गाँव-शहर ला जोड़ के, जग ला छोट बनाय।।

‎

‎डिक्टो मनखे कस लगे, फेर चले ना साँस।

‎पहिरे फटहा कोट ला, काया लउठी बाँस।।

‎

‎दुरिहा जावय पाँव बिन, संदेसा पहुँचाय। 

‎ओकर मुँह नइहे तभो, जम्मो बात बताय।।

‎

‎करिया धूसर रूप धर, भागत चढ़य अगास।

‎आँखी मा पानी भरे, खांसत निकले साँस।।

‎

‎उत्तरमाला

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‎🎶 बंसी (बासुरी)• 🥥 नरियर (नारियल )• 🪨 चकमक  • 🐚 शंख • 🔥 चिमटा • 💦 पसीना • 🛣️ रद्दा (सड़क )• 🌾 पुतला • ✉️ पाती (चिट्ठी )• 🌫️ धुआँ

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‎रचनाकार -हेमलाल साहू

‎चिरई के गाँव - गिधवा, जिला-बेमेतरा

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‎🐸 मेचका (बाल कविता)‎

‎🐸 मेचका (बाल कविता) ‎ ‎टप-टप बरसे सुग्घर पानी, ‎नान्हे मन ला भावय। ‎गात मया के गीत मेचका, ‎टर्र-टर्र ले टर्रावय।। ‎ ‎उत्ताधुर्रा जीभ लमावय...

सबले ज्यादा पढ़े गिस