कहिथे पुस्तक (सरसी छंद)
कहिथे पुस्तक चिंकी,पिंकी,
बन जा साथी मोर।
पढ़ के मोला करबे सुरता,
काम आँव मँय तोर।।
सुघ्घर भर के रखें हवँव मँय ,
दुनिया भर के ज्ञान।
पढ़त-पढ़त बन जाबे संगी,
तँय बड़का विद्वान।।
उल्टी पलटी पन्ना पलटत,
पढ़ के लेबे देख।
पाबे नाटक, कहनी, कविता,
सुघ्घर सुग्घर लेख।।
डॉक्टर, मास्टर, कानूनी बर
मोर सहारा लेत।
तब जाके दुनिया ला चिंकी,
अच्छा सेवा देत।।
भगवत गीता रामायण मँय,
चारो वेद पुरान।
रग-रग मा मोर बसे हावय,
आखर बन भगवान।।
गौरव गाथा मँय अतीत के,
सबो समाये काल।
पढ़के जानव भविष्य अउ
वर्तमान के हाल।।
मोबाइल युग मा झन करहूँ,
मोला टाल मटूल।।
पढ़ लिख के मोरो रख लेहूँ,
चिंकी पिंकी मूल।।
-हेमलाल साहू
छंद साधक, सत्र-१
ग्राम-गिधवा, जिला बेमेतरा
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